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मां हरियाली के गंगा स्नान के साथ नवासू में 9 दिवसीय जात शुरू

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रुद्रप्रयाग। धारी में मां भगवती से मिलन और अलकनंदा नदी में गंगा स्नान के बाद अपने थान में विराजमान हुई मां हरियाली देवी की नौ दिवसीय जात नवासू गांव के प्राचीन मंदिर में शुरू हो गई है।
अगस्त्यमुनि ब्लाक के ग्राम पंचायत नवासू में सुबह सात बजे मंदिर में पूजा-अर्चना के बीच कपाट खोले गए। इसके बाद परिसर में यज्ञ-हवन किया गया। सुबह 8.30 बजे आराध्य के पश्वा, पंडित व अन्य लोग धारकोट तोक पहुंचे। जहां आराध्य की भव्य मूर्ति में विराजमान है। यहां पर विशेष-पूजा अर्चना के साथ विधि-विधान से श्रृंगार किया गया। मूर्ति को सोने के गहने व चांदी का मुकुट पहनाने के बाद चौक में लाया गया। यहां पर वेद मंत्रों व गायत्री शक्तियों के साथ देवी का आह्वान करने के साथ ही डोली व निषाणों पर तंत्र, मंत्र और सिद्धियां प्रवाहित कर मूर्ति को विराजमान किया गया। पूर्वाह्न 11 बजे मां हरियाली देवी ने भक्तों के जयकारों के साथ गंगा स्नान के लिए प्रस्थान किया। 12.30 बजे धारी देवी पहुंचकर अलकनंदा नदी के तट पर देवी को स्नान एवं विशेष पूजा हुई। 1.15 बजे मां हरियाली ने मां भगवती धारी देवी के प्रागंण में पहुंच कर भेंट की। बाद में 3.30 बजे डोली नवासू गांव पहुंची। यहां पर मां कालिंका व सत्यनाथ भगवान ने अगुवानी की। उसके बाद शाम 4.30 बजे बांज-बुरांश के जंगल के बीच में स्थित अपने मूल मंदिर पहुंची। यहां पर मूर्ति को मंदिर में विराजमान किया गया। अब 27 दिसंबर तक यहां मंदिर परिसर में विशेष पूजा होगी।
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तीन ग्राम पंचायतें हैं शामिल
मां हरियाली देवी के जात ग्राम पंचायत नवासू, बंगोली और निषणी के संयुक्त सहयोग से हो रही है। इसके साथ ही खिंगासारी, डांडरा, सारगड्डी, मोल्ठा, पणधारा, कलेथ, ढोमाणी, कपलखील, चुराडोब गांव/तोक के दो सौ से अधिक परिवार शामिल हैं।

ध्याणियों का होता विशेष पर्व
हरियाली जात को ध्याणियों (विवाहिता बेटी व बहन) का पर्व माना जाता है। आयोजक गांवों के सभी परिवार अपनी ध्याणियों को एक माह पहले ही बुलाया भेज देते हैं। नौ दिनों तक ध्याणियां जात में शामिल होती हैं। विदाई में समिति की ओर से उन्हें प्रसाद व विशेष भेंट दी जाती है। इस मौके पर ध्याणियां भी अपनी मैती देवी को छत्र, घंटी व श्रृंगार सामग्री देकर घर, परिवार की कुशलता की मनौती मांगती हैं।

नंद के घर जन्मी योगमाया है मां हरियाली
रुद्रप्रयाग। हरियाली देवी का मूल मंदिर धनपुर पट्टी के जसोली क्षेत्र का हरियाल डांडा है। यहां बांज-बुरांश के घने जंगल के बीच आराध्य का मंदिर है। वहीं, नवासू में भी गांव से करीब सवा किमी ऊपर जंगल के बीच में देवी का मंदिर है। हरियाल डांडा व नवासू गांव एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां हरियाली को भगवान श्रीकृष्ण की बहन योगमाया का रूप माना जाता है। कहा जाता है कि द्वापर युग में जब मथुरा के राजा कंस ने देवकी की आठवीं संतान समझकर पत्थर पर पटकने का प्रयास किया तो वह छिटककर अंर्तध्यान हो गई थी। वह कन्या हरी पर्वत पर उतरती है, जिसे हरियाला डांडा कहा जाता है।


1990 में हो गई पशुबलि बंद
नवासू गांव में वर्ष 1990 में पशुबलि को बंद कर काली के मंदिर में प्रत्येक छह वर्ष में श्रीमद् देवी भागवत पुराण और हरियाली देवी में 12 वर्ष में जात आयोजन का निर्णय लिया गया। यह क्षेत्र का पहला गांव है, जहां 90 के दशक में पशुबलि बंद कर दी गई थी। 90 के दशक से पहले नवासू गांव के मंदिरों में पूजा-अर्चना के तहत पशुबलि होती थी। वर्ष 1991 में ग्रामीणों ने पशुबलि बंद करने का निर्णय लिया। इसके बाद दिसंबर 1992 में कालिंका मंदिर में पहली बार 11 दिवसीय श्रीमद देवी भागवत पुराण का आयोजन किया गया था। यहां पर प्रत्येक छह वर्ष में यह आयोजन होता है।
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जात में भी होती थी बलि
नवासू गांव में हरियाली देवी की जात में पहले बलि होती थी। पूर्वजों का हवाला देते हुए मंदिर समिति के संरक्षक प्रेम सिंह रौथाण बताते हैं कि वर्ष 1946 में हुई तीन दिवसीय जात में प्रतिदिन 10 बकरों की बलि दी जाती थी। लेकिन वर्ष 1994 से बिना बलि की जात हो रही है।
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