वातावरण में आई नमी से हजारों हेक्टेयर भूमि पर लहलहा रही गन्ने की फसल में काला चिकटा, ग्रास हॉपर, पायरिला आदि रोग लगने की संभावना बढ़ गई है। ऐसे में गन्ना विभाग के अधिकारी किसानों को कीटों के प्रति सावधान रहने के लिए कह रहे हैं तो वहीं कृषि वैज्ञानिक रोग लगने पर उससे बचाव के तरीके भी बता रहे हैं।
गन्ना और चीनी उत्पादन में प्रदेश में जिला हरिद्वार अग्रणी पंक्ति में रहता है। यही वजह है कि इस समय जिले में 56 हजार हेक्टेयर भूमि पर गन्ने की फसल लहलहा रही है। वैसे तो हर साल मई और जून में भीषण गर्मी पड़ती है, लेकिन जून शुरू हो जाने के बाद भी इस बार इतनी गर्मी नहीं हुई, जितनी होनी चाहिए थी। आए दिन मौसम में उतार-चढ़ाव हो रहा है। कभी तेज बारिश तो कभी तेज हवा और कभी बूंदाबांदी के चलते वातावरण में लगातार नमी बढ़ रही है। वातावरण में अधिक नमी बढ़ने और तापमान में गिरावट के कारण गन्ने की फसल में रोग लगने का खतरा बढ़ गया है। इस समय फसल में पायरिला, ग्रास हॉफर व काला चिकटा आदि के पनपने के आसार बढ़ गए हैं। यदि गन्ने में ये कीट पनप जाते हैं तो वे फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। ज्येष्ठ गन्ना विकास निरीक्षक प्रदीप वर्मा ने बताया कि क्षेत्र में गन्ना सर्वे कर रहे सभी गन्ना पर्यवेक्षक को निर्देश दिए गए हैं कि वे किसानों से इस बाबत भी जानकारी लें कि उनकी फसल में कोई रोग तो नहीं लगा दिखाई पड़ रहा है ताकि समय पर उपचार किया जा सके।
क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक
लक्सर। कृषि वैज्ञानिक केंद्र धनौरी के प्रभारी पुरुषोत्तम कुमार का कहना है कि गन्ने की फसल में काला चिकटा रोग दिखने पर इंडोसल्फास 35 प्रतिशत, क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत और फेनिटोथियान 50 प्रतिशत का छिड़काव करें। टिड्डा या ग्रास हॉपर का प्रकोप होने पर जुलाई-अगस्त में मैलाथियान 50 प्रतिशत, बायोनीम, लिंडेन 1.3 प्रतिशत, फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत का छिड़काव करें। पायरिला रोग दिखने पर जैविक कीटनाशक मेटाराईजियम का छिड़काव करें।
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