रुड़की। महिलाएं आज हर क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं। पुरुषों के एकाधिकार वाले काम में महिलाओं को देख बदलते जमाने का एहसास होता है। कुछ ऐसी ही कहानी है कि कभी घर से बाहर तक नहीं निकलने वाली सरिता की, जो रोडवेज की बसों में टिकट काट रही हैं। पति की मौत के बाद बच्चों के पालन-पोषण के लिए पहले आंगनबाड़ी में काम किया। बाद में पति की जगह परिचालक की नौकरी मिली। आज वह आत्मनिर्भर हैं और अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत भी।
नैनीताल निवासी सरिता आर्य की शादी वर्ष 1985 में मुजफ्फरनगर के बसेड़ा गांव निवासी कालूराम से हुई थी। पति रोडवेज में ड्राइवर थे। परिवार में सब ठीक चल रहा था। इसी बीच वर्ष 2003 में दो बेटों और दो बेटियों की जिम्मेदारी देकर पति चल बसे। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट गया। मायकेवालों ने उनकी मदद जरूर की, लेकिन उन पर बोझ बनना सरिता को खल रहा था। ऐसे में उन्होंने आंगनबाड़ी में काम शुरू कर दिया, लेकिन चार बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और अन्य खर्चों के बीच आर्थिक तंगी सामने आने लगी। किसी ने उन्हें पति की जगह नौकरी के लिए आवेदन करने की सलाह दी। उन्होंने आवेदन किया तो परिवहन निगम में परिचालक की नौकरी मिल गई, जो उनके लिए बड़ी चुनौती थी। क्योंकि, इससे पहले वह कभी अकेले बाजार तक नहीं गई थीं। परिवार की स्थिति देख उन्होंने हिम्मत जुटाई और वर्ष 2014 में परिचालक की नौकरी शुरू कर दी। सरिता बताती हैं कि पहले दिन रुड़की से मुजफ्फरनगर तक की बस में उनकी ड्यूटी लगी।
उस दिन को वह कभी नहीं भूल सकतीं। पहले ही दिन टिकट बनवाने को लेकर विवाद हो गया। मुजफ्फरनगर के नौ युवकों ने टिकट बनवाने से इनकार कर दिया। डिपो लौटीं तो सहकर्मियों ने हिम्मत बंधाई और समझाया कि ये परिस्थितियां रोज सामने आने वाली हैं। इसलिए उनका सामना करना पड़ेगा। अब काम करते हुए छह साल हो गए। सरिता कहती हैं कि किसी भी महिला के जीवन में ऐसे उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। उन्हें हौसले से काम लेना चाहिए। ऐसा कोई काम नहीं है, जिसे महिलाएं नहीं कर सकती हैं। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे परिचालक जैसे काम को कर पाएंगी, लेकिन परिवार के लिए और आत्मनिर्भर बनने के लिए ये काम भी किया।