उत्तराखंड का अधिकांश पवर्तीय हिस्सा जोन पांच में आता है। जो भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील श्रेणी में है। इस जोन में आठ तीव्रता के भूकंप की आशंका लगातार बनी रहती है। सोमवार को आए 5.8 मैग्रीट्यूट के भूकंप ने पहाड़ों को हिलाकर रख दिया। यदि यह मैग्नीट्यूड दो अंक और ज्यादा होता तो जमीन से निकलने वाली ऊर्जा की मात्रा इस भूकंप से 1000 गुना अधिक होती। ऐसे में खासकर उत्तराखंड राज्य में भूकंपरोधी भवनों पर बहुत ज्यादा जोर दिए जाने की आवश्यकता है।
आईआईटी के भूकंप अभियांत्रिकी विभाग के अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र सिंह ने बताया कि सोमवार को आया 5.8 मैग्नीट्यूड का भूकंप खतरे के लिहाज से गंभीर नहीं था। जबकि जोन पांच में आठ मैग्नीट्यूड तक के भूकंप की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि मैग्रीट्यूड में एक अंक की बढ़ोत्तरी के साथ जमीन से निकलने वाली ऊर्जा की मात्रा 30 गुना अधिक होती है। यदि यह भूकंप दो मैग्नीट्यूट यानी 7.8 का होता तो इससे निकलने वाली ऊर्जा की मात्रा सोमवार को आए भूकंप से निकली ऊर्जा से 1000 गुना अधिक होती। हालांकि भूकंप से होने वाला नुकसान इस बात पर भी निर्भर करता है कि भूकंप का केंद्र जमीन से कितनी गहराई पर है। इस लिहाज से उत्तराखंड में खास तौर से भूकंप रोधी भवनों के निर्माण और अन्य उपायों पर बहुत ज्यादा जोर दिए जाने की आवश्यकता है।
भूकंप रोधी भवनों के मानकों में हुआ बदलाव
भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की ओर से भूकंप रोधी भवनों के मानकों में बदलाव किया जा रहा है। इसके तहत भूकंपरोधी भवनों से संबंधित एक कोड आईएस 13920 में विगत जुलाई 2016 में बदलाव कर दिया गया है। जबकि एक अन्य कोड 1893 में बदलाव के लिए ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है। नये मानकों को तैयार करने में आईआईटी के भूकंप वैज्ञानिक प्रो. डीके पोल भी भूमिका निभा रहे हैं। गौरतलब है कि बीएसआई के मानकों की जरूरत उस समय महसूस हुई थी जब करीब दो वर्ष पूर्व नेपाल में आए भूकंप के दौरान भारतीय मानकों के अनुसार बनी बिल्डिंगों की दीवारों में दरारें आ गई थी। बताया गया है कि पूर्व के कोड से बने भवनों में भूकंप के दौरान स्ट्रक्चर में कोई दरार नहीं पड़ती थी, लेकिन दीवारों में दरारें आ जाती थी। जिसके बाद अब मानकों में बदलाव की कवायद शुरू कर दी गई है।