पिछले 47 वर्षों में गंगा नदी के रुख में हो रहे बदलाव खतरे का संकेत दे रहे हैं। रुड़की, आईआईटी की ओर से किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन के बाद आईआईटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग ने केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।
आईआईटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर जेड अहमद बताया कि देवप्रयाग से लेकर बांग्लादेश की सीमा के फरक्का तक लगभग 1824 किलोमीटर क्षेत्र में गंगा का अध्ययन किया गया। इस कार्य में लगभग दो साल लग गए। अध्ययन में पाया गया कि बीते 47 वर्षों में जो बदलाव गंगा में हुए हैं, वे काफी डराने वाले हैं। प्रो. अहमद ने कहा कि पूरी रिपोर्ट का खुलासा तो नहीं किया जा सकता है लेकिन यह काफी अलार्मिंग है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक गंगा के रुख में परिवर्तन से दो तरह के खतरे संभावित हैं। पहला खतरा यह कि भविष्य में कुछ इलाकों को सूखे का सामना करना पड़ सकता है, जबकि दूसरा खतरा कुछ इलाकों में बाढ़ की विभीषिका की ओर संकेत करता है। आईआईटी द्वारा किए गए अध्ययन के अंतर्गत गंगा में साल 1970 से लेकर अब तक के हुए परिवर्तनों का बारीक निरीक्षण किया गया है। इसमें गंगा पर बने बैराज व अन्य निर्माणों के साथ ही धारा में आए बदलाव, कटान, भराव सहित विभिन्न पहलू शामिल हैं।
गंगा पर हो रहा अतिक्रमण खतरनाक
वैज्ञानिकों के मुताबिक गंगा पर लगातार बढ़ता अतिक्रमण खतरे का संकेत है। उत्तराखंड में पहाड़ से लेकर मैदान तक गंगा पर अतिक्रमण हुआ है। कोर्ट और सरकार की ओर से गंगा किनारे की इमारतों को हटाने के निर्देश दिए जा चुके हैं, लेकिन नतीजा सिफर रहा है। यही वजह है कि कुछ साल पहले जब गंगा की धारा बदली तो पहाड़ों से लेकर मैदानों में काफी तबाही मची थी।