अपने कड़े अनुशासन और सख्त फैसलों के लिए जानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती उत्तराखंड में लगातार दरक रहे बसपा के संगठन को संभाल पाने में सफल होती नहीं दिख रही हैं। खासतौर पर उत्तराखंड में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को लेकर उन्होंने जितने भी प्रयोग किए उनमें से अधिकतर लगातार फेल होते जा रहे हैं। फल स्वरूप राज्य बनने के 20 साल बाद बहुजन समाज पार्टी को उत्तराखंड में प्रदेश अध्यक्ष चुनने के लिए बाहरी कार्यकर्ता पर विश्वास जताना पड़ा। एक बार फिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के निवासी नरेश गौतम को उत्तराखंड का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है।
वर्ष 2000 में जब उत्तराखंड का गठन हुआ था, उस समय हरिद्वार जनपद में बहुजन समाज पार्टी सबसे मजबूत राजनीतिक दल थी। 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में 9 में से 5 सीट जीतकर बसपा ने अपनी धमक का परिचय कराया था। 2012 के चुनाव में तो पार्टी के नेताओं का आत्मविश्वास इतना बढ़ा हुआ था कि वह उत्तराखंड में भी अपनी सरकार बनाने का दावा कर रहे थे।
हालांकि इसी चुनाव में बसपा का ग्राफ गिरना शुरू हो गया था। उस समय बसपा केवल तीन ही सीटें जीत पाई थी। उसमें से भी दो विधायक पार्टी से अलग होकर कांग्रेस का हाथ थाम बैठे थे। राज्य गठन के बाद से कई बार बसपा को उत्तराखंड के नेताओं के बजाए बाहरी नेताओं की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी करनी पड़ी। सबसे पहले आरके बर्मन, फिर दो बार डॉ. मेघराज जरावरे जहां सहारनपुर जनपद से आकर उत्तराखंड में बसपा की कमान संभाल चुके हैं। वहीं तीन साल पहले युवा नेता कुलदीप बालियान को भी सहारनपुर से लाकर उत्तराखंड की कमान सौंपी। पार्टी प्रदेश के कई नेताओं जिनमें चरण सिंह, नत्थू सिंह चौधरी, शीशपाल सहित कई नेताओं पर दांव खेल चुका है, लेकिन पार्टी हाईकमान के इशारों पर उम्मीदों पर कोई भी सफल नहीं हो सका। पार्टी हाईकमान को एक बार फिर बाहरी सेनापति पर ही दांव खेलना पड़ा और सहारनपुर के रहने वाले बसपा के पुराने समर्पित कार्यकर्ता नरेश गौतम को पार्टी की कमान सौंप दी गई है। नरेश गौतम का कहना है कि वे पार्टी को मजबूत बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।