रुड़की। जिला पंचायत चुनाव में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद आखिर बसपा ने अंतिम समय में हथियार क्यों डाल दिए। यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है। सियासी जानकार और खुद पार्टी के रणनीतिकार भी कांग्रेस और बसपा की सियासी ढील से अनजान हैं। बसपा के अधिकतर पदाधिकारी इसे हाईकमान का फैसला बता रहे हैं।
जिला पंचायत में बसपा के 16 सदस्य हैं। जबकि कांग्रेस के मात्र 11 सदस्य हैं। इसके अलावा भाजपा के तीन और सबसे अधिक निर्दलीय सदस्य 17 हैं। आंकड़ों के अनुसार बसपा के सदस्यों की संख्या कांग्रेस से काफी अधिक है। यही कारण है कि जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए चल रही खींचतान और जोड़तोड़ में बसपा का पलड़ा भारी माना जा रहा था। बसपा को 16 सदस्यों के साथ कुछ कांग्रेस और निर्दलीय जिला पंचायत सदस्यों का भी समर्थन प्राप्त था। यानी कुल मिलाकर जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए बसपा प्रबल दावेदार मानी जा रही थी। दूसरी ओर कांग्रेस से चौधरी राजेंद्र सिंह अपने छोटे भाई की पत्नी सविता चौधरी के लिए जोड़ तोड़ में लगे थे। उनकी ओर से भी जीत के दावे किए जा रहे थे।
इसके लिए दोनों ही ओर से छह मई को नामांकन दाखिल कर दिया था। अब 13 मई का इंतजार किया जा रहा था। जिस दिन मतदान और मतगणना के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष की घोषणा होनी थी। उससे पहले 10 मई को अचानक बसपा प्रत्याशी मोहम्मद सत्तार की नाम वापसी किसी के गले नहीं उतर रही है। शहर से देहात तक यही चर्चा रही कि आखिर बसपा और कांग्रेस में क्या सियासी डील हुई होगी। जिससे बसपा ने न सिर्फ विधानसभा में शक्ति परीक्षण के दौरान कांग्रेस के समर्थन में वोट दिया।
बल्कि जिले की सरकार के लिए भी कांग्रेस प्रत्याशी सविता चौधरी का रास्ता साफ कर दिया। यह सवाल आमजन के साथ बसपा के आला नेताओं के भी समझ से परे है। इस संबंध में बसपा जिला पंचायत के रणनीतिकार मोहम्मद शहजाद और बसपा के प्रदेश प्रभारी दोनों का कहना है कि पार्टी हाईकमान के निर्देश पर उक्त फैसला लिया गया है।