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रिएडमिशन, डोनेसन और कॉशन मनी नहीं ले सकते स्कूल: जेएम

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रुड़की। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट (जेएम) ने बृहस्पतिवार को विभिन्न मुद्दों पर निजी स्कूल संचालकों के साथ बैठक कर आदेश दिए कि वह अपने-अपने स्कूलों में रि-एडमिशन, डोनेशन और कॉशन मनी (जमानत राशि) नहीं ले सकते। यह पूर्णत नियमों के विपरीत है। सुरक्षा आदि विभिन्न मुद्दों पर स्कूलों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। इस दौरान स्कूल संचालकों ने भी अपनी समस्याएं रखी।
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बृहस्पतिवार शाम जेएम नितिका खंडेलवाल ने सीबीएसई और आईसीएसई के निजी स्कूल संचालकों की तहसील परिसर में बैठक ली। इस दौरान जेएम ने कहा कि स्कूल अभिभावकों के साथ समन्वय बनाकर चलें। स्कूल रि-एडमिशन फीस, डोनेशन और जमानत राशि नहीं ले सकते। स्कूल जो वार्षिक शुल्क लेते हैं उसमें यह स्पष्ट नहीं होता है कि इसमें कितना शुल्क किस सुविधा का लिया जा रहा है। इसमें अभिभावकों की शिकायतें रहती हैं कि उनसे एक-एक सुविधा का कई-कई बार शुल्क लिया जा रहा है। ऐसे में सभी स्कूल संचालक वार्षिक फीस में प्रत्येक सुविधा का शुल्क स्पष्ट करें। किसी भी अभिभावक को निश्चित दुकान से पुस्तक खरीदने के लिए बाध्य न करें। जेएम ने स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे आदि लगाने और स्कूल बसों में फस्ट एड बॉक्स लगाने के निर्देश दिए। बैठक में जेएम ने निर्देश दिए कि संचालक अपने-अपने स्कूलों में प्राइमरी व जूनियर के लिए अलग-अलग टॉयलेट की व्यवस्था करें। स्टाफ का रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य रूप से कराने के निर्देश दिए। इस दौरान एनसीईआरटी की पुस्तकें लागू करने को लेकर चर्चा हुई, लेकिन मामला कोर्ट में विचाराधीन होने के कारण इस पर खास चर्चा नहीं हो पाई। बैठक में जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक मेहरबान सिंह बिष्ट, खंड शिक्षा अधिकारी श्रीकांत पुरोहित, समन्यवक समीर शर्मा, अशोक चौहान, अभिषेक चंद्रा, कुंवर जावेद इकबाल, सुनील राठी, पीके सिंह, राजीव गुप्ता, राजेंद्र सिंह रावत, एमओ जार्ज आदि मौजूद रहे।
निजी स्कूल सरकारी कार्यक्रम में भी करें सहयोग
बैठक में खंड शिक्षा अधिकारी श्रीकांत पुरोहित ने कहा कि सरकार द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रम में कुछ स्कूल सहयोग नहीं करते। जिसके चलते ऐसे मामले मीडिया में छाए रहते हैं। उन्होंने आधारकार्ड, मतदाता दिवस आदि सरकारी कार्यक्रम में सहयोग की मांग की है।
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छह-छह साल से नहीं मिला आरटीई का पैसा
बैठक में उठा मामला, दो बार गायब हो चुकी भुगतान की फाइल
अमर उजाला ब्यूरो
रुड़की। जेएम की बैठक में आरटीई के भुगतान का मामले ने जमकर तूल पकड़ा है। निजी स्कूल संचालकों का कहना था कि जब कार्यालय से दो-दो बार भुगतान की फाइल गायब हो जाती है तो स्कूलों को आरटीई का भुगतान कैसे हो। स्कूलों का दावा है कि विभाग के पास करीब छह-छह साल का भुगतान रुका पड़ा है।
आईटीई के अनुसार प्रत्येक स्कूल में कुल छात्र संख्या का 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के लिए आरक्षित है। इस पर निजी स्कूलों को गरीब बच्चों को पढ़ना होता है। इन बच्चों की फीस आदि का वहन सरकार द्वारा किया जाता है, लेकिन निजी स्कूलों को पिछले छह-छह साल से आईटीई का पैसा नहीं मिल पाया है। आलम यह है कि जेएम की बैठक ने मामले में खासा तूल पकड़ा। इस दौरान प्राईवेट स्कूलों का कहना था कि करीब दो साल पहले आरटीई के भुगतान की फाइल दो साल पहले दो बार ब्लाक स्तर पर जमा कराई गई, लेकिन यह फाइल दोनों बार गायब हो गई। जिसके चलते जब फाइल ही कार्यालयों तक नहीं पहुंच रही है, तो उनका भुगतान कैसे हो। स्कूलों का दावा यह भी था कि जिसके चलते उन्हें सीधे जिला कार्यालय के टच में रहना पड़ता है। इस पर शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बजट के अभाव होने का दावा करते हुए भुगतान न होने से पल्ला झाड़ दिया।
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