तीर्थनगरी ऋषिकेश के आसपास के क्षेत्रों में भी होली के रंगों के बीच फूलदेई पर्व धूमधाम से मनाया गया। गांव और आसपास क्षेत्र में बच्चों ने दहलीज पर फूल डाले। इस दौरान फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरी भकार गीत भी बच्चों ने गाया। फूलदेई के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में शाम को बच्चों ने रिंगाल की टोकरी लेकर फ्यूंली, बुरांस, बासिंग, आडू, पुलम, खुबानी आदि के फूलों को एकत्रित किया। उसके बाद अगले दिन सुबह घर-घर जाकर उन्होंने लोगों की सुख-समृद्धि के पारंपरिक गीत गाते हुए देहरियों में फूल रखे। गैंडखाल, घट्टूगाड़, दोगी पट्टी, सिलोगी, नौड़खाल आदि गांवों में बच्चों ने फूलदेई पर अपने घर के अलावा आस पास लोगों के घरों में फूल डाले। बारगिड़ गांव के ग्रामीण रघुवीर सिंह, भगत सिंह, सौड़ गांव के ग्रामीण नरेंद्र सिंह ने बताया कि चैत्रमास शुरू होते ही पहाड़ों में बच्चे अपने घर और लोगों की दहलीज पर फूल बिखेरते हैं।फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरी भकार... गीत गाते हुए बच्चों को लोग इसके बदले में दाल, चावल, आटा, गुड़, घी और दक्षिणा (रुपए) दान करते हैं। पूरे माह में यह सब जमा किया जाता है। इसके बाद घोघा (सृष्टि की देवी) पूजा की जाती है। चावल, गुड़, तेल से मीठा भात बनाकर प्रसाद के रूप में सबको बांटा जाता है। कुछ क्षेत्रों में बच्चे घोघा की डोली बनाकर देव डोलियों की तरह घुमाते हैं। अंतिम दिन उसका पूजन किया जाता है। पहाड़ में वसंत के आगमन पर फूलदेई मनाने की परंपरा है। डॉ. राजे नेगी ने बताया कि यह त्योहार गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश क्षेत्रों में धूमधाम से मनाया जाता है। बच्चों से जुड़ा त्योहार होने के चलते इसे खूब पसंद भी किया जाता है। फूलदेई पूरी तरह बच्चों का त्योहार है। इसकी शुरुआत से लेकर अंत तक का जिम्मा बच्चों के पास ही रहता है। इस त्योहार के माध्यम से बच्चों का प्रकृति और समाज के साथ जुड़ाव बढ़ता है। यह हमारी समृद्ध संस्कृति का पर्व है। यह करीब एक माह तक मनाया जाता है।