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गुमनामी के अंधेरे में न खो जाए रामतीर्थ की तप स्थली

Thu, 09 Jun 2016 02:52 AM IST
गंगादत्त थपलियाल /अमर उजाला, ऋषिकेश
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स्वामी रामतीर्थ की तपस्थली - फोटो : amar ujala
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महापुरुष इस संसार में आते हैं और संसार के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर अलविदा कह जाते है। पर उनके जाने के बाद भी उनके जीवन से जुड़ी चीजें धरोहर बनकर हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। लेकिन ऋषिकेश-देवप्रयाग मोटर मार्ग पर ब्रहमपुरी में गंगा तट पर स्वामी रामतीर्थ की तप स्थली आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। समय रहते इस ऐतिहासिक गुफा का संरक्षण नहीं किया गया तो यह गुमनामी के अंधेरे में खो जाएगी।
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भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को पूरे विश्व में प्रचारित करने वाले स्वामी रामतीर्थ का टिहरी और मां गंगा से बड़ा लगाव था। हिमालय यात्रा के दौरान लक्ष्मणझूला के निकट ब्रहमपुरी में गंगा तट पर एक गुफा में रहकर उन्होंने तप किया था। साधना के उच्च सौपान पर पहुंचने पर स्वामी रामतीर्थ को इस पवित्र गुफा में कई अलौकिक अनुभव प्राप्त हुए थे। लेकिन आज यह राम गुफा जहां पूरी तरह से उपेक्षित पड़ी हैं। सरकार की ओर से भी इसके संरक्षण के लिए कोई कार्य नहीं किया गया है।

हैरत की बात यह है कि इस तप स्थली तक जाने का कोई रास्ता न होने से किसी साधक के लिए यहां पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। योग के जानकारों के अनुसार ऐसे स्थानों पर बैठने मात्र से साधक की अनसुलझी कई शंकाओं का समाधान प्राप्त होता है। क्योंकि सूक्ष्म रूप से महापुरुषों की वहां उपस्थिति होती है। मगर इस स्थान का संरक्षण और प्रचार-प्रसार न होने से यह गुमनामी के अंधेरे में खोई हुई है। अभी स्थिति यह है कि उनके कुछ भक्तों ने गुफा के ऊपर स्वामी रामतीर्थ की फोटो और झंडा लगाकर इस स्थान को जिंदा किया हुआ है। लेकिन महत्व के अनुरूप इसका संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार न किए जाने यह स्थान गुमनाम हो जाएगा।
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एसआरटी (स्वामी रामतीर्थ) आश्रम समिति टिहरी के काका हरिओम, पंडित विनोद चमोली, डा. प्रभाकर जोशी का कहना है कि आज के समय में देश को एकता, संगठन, राष्ट्रधर्म और विज्ञान साधना की आवश्यकता है। ऐसे में एक आदर्श गणितज्ञ और अनुपम समाज सुधारक स्वामी रामतीर्थ के जीवन का प्रत्येक पक्ष हमारे लिए प्रेरणाप्रद है। इसके लिए जरूरी है कि स्वामी रामतीर्थ के जीवन से जुड़ी तप स्थली का रख रखाव कर इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सरंक्षण किया जाए। जिससे विश्वभर में इस स्थान का दर्शन कर लोग प्रेरणा ले सके।

कौन थे स्वामी रामतीर्थ
स्वामी रामतीर्थ के बचपन का नाम तीर्थ राम था। इनका जन्म गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) के मुरारीवाला ग्राम में सन 1873 को दीपावली के दिन हुआ था। पिता हीरानंद गोस्वामी ने कठिन परिस्थितियों में इन्होंने शिक्षा ग्रहण की। बाल्यकाल में विवाह हो गया था। परिजन चाहते थे कि तीर्थराम गृहस्थ में रहे।  लेकिन वे सत्य की खोज में घर से निकल पड़े। देवभूमि उत्तराखंड में अपनी साधन को अंतिम रूप दिया।

आत्मानुभूमि के बाद स्वामी रामतीर्थ ने उत्तराखंड के विभिन्न तीर्थ स्थलों की पैदल यात्रा करने के बाद जापान, अमेरिका सहित कई देशों की यात्रा की। इनका संदेश था कि इसी जीवन में मुक्ति का अनुभव करो। 1906 को उन्होंने टिहरी में अपने पार्थिव शरीर को गंगा की धारा में समर्पित कर दिया दिया था। टिहरी बादशाही थौल में गढ़वाल विवि के परिसर का नामकरण स्वामी रामतीर्थ के नाम पर हुआ। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर टिहरी के तत्कालीन राजा ने उन्हें एक भवन दान में दिया था। यह भवन पुरानी टिहरी डूबने पर झील में जल मग्न हो गया था। बाद में पुर्नवास विभाग ने उनके नाम पर कोटी कालोनी में गोल कोठी बनाई है।
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