उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की ओर से आयोजित संस्कृत मास महोत्सव में प्रदेश के सभी 13 जनपदों में ई-संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। जिसमें देहरादून जिले की ई-संगोष्ठी डॉ. जनार्दन प्रसाद कैरवान के संयोजन में सम्पन्न की गई।
शनिवार को आयोजित ई-संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉ. प्रकाश चमोली ने उत्तराखंड की धर्मशास्त्र परंपरा का अनुसंधानात्मक दृष्टि से विश्लेषण किया। कहा कि धर्मशास्त्र मानव के संपूर्ण क्रिया-कलापों को मर्यादित रखने में बल देते हैं। उत्तराखंड में अनेक धर्म शास्त्रों का निर्माण, अनुष्ठान व अनुसंधान हुआ है। जिसका प्रचार प्रसार किया जाना आवश्यक है। मुख्य शिक्षा अधिकारी देहरादून प्रदीप कुमार ने संस्कृत भाषा में अपने विचार व्यक्त किए। कहा कि संस्कृत भाषा का दैनिक जीवन में प्रयोग होना चाहिए। संस्कृत पृष्ठभूमि से न होने के बावजूद संस्कृत भाषा में उद्बोधन ने सभी के लिए प्रेरणा का काम किया।
सहायक निदेशक संस्कृत शिक्षा डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ने कहा कि धर्म आचरण का विषय है। धर्मशास्त्र की सुदृढ परंपरा में उत्तराखंड अग्रणी है। राधाकृष्ण अमोला ने धर्मशास्त्र परंपरा का शास्त्रीय व व्यावहारिक पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि धर्म के दो प्रकार हैं। एक लौकिक जिसके धारणा से समाज उन्नति कर सकता हैं। वहीं वैदिक धर्म से मोक्ष भी प्राप्त किया जा सकता है।
संगोष्ठी में संस्कृत अकादमी के शोध अधिकारी डॉ. हरीश चंद्र गुरुरानी ने अकादमी की ओर से किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। अकादमी के साथ मिलकर संस्कृत के उत्थान में योगदान प्रदान करने का आह्वान किया। इस मौके पर शांति प्रसाद मैठाणी, संजय शास्त्री, विजय जुगलान, विपिन बहुगुणा, सुभाष डोभाल, जितेंद्र भट्ट, डाॅ. नवीन पंत, डॉ. प्रकाश चंद रूवाली आदि मौजूद रहे।