पाक रमजान माह के रोजे और इबादतों के बाद आने वाला ईद-उल फितर का त्योहार खुदा का इनाम है। खुशियों का गुलदस्ता है, मुस्कुराहटों का मौसम है और जश्न की रौनक है। इसलिए ईद का चांद नजर आते ही माहौल में एक गजब का उल्लास छा जाता है। ईदगाह में नमाज के बाद अल्लाह से दुआएं मांगते व रमजान के रोजे और इबादत की हिम्मत के लिए खुदा का शुक्र अदा करते हजारों हाथ हर तरफ दिखाई पड़ते हैं। यह उत्साह बयान करता है कि लो ईद आ गई। सिवइयों या शीर-खुरमे से मुंह मीठा करने के बाद छोटे-बड़े, अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन गले मिलते हैं तो चारों तरफ मोहब्बत ही मोहब्बत नजर आती है। एक खुशी से दमकते सभी चेहरे इंसानियत का पैगाम माहौल में फैला देते हैं।
देहरादून के नायब शहर काजी सुन्नी सैय्यद अशरफ हुसैन कादरी तेलीवाला जामा मसजिद के इमाम मुफ्ती करामत अली ने बताया कि कि पैगंबरे इस्लाम ने कहा है कि जब अहले ईमान रमजान के पवित्र महीने के एहतेरामों से फारिग हो जाते हैं और रोजों-नमाजों तथा उसके तमाम कामों को पूरा कर लेते हैं, तो अल्लाह एक दिन अपने उस इबादत करने वाले बंदों को बख्शीश व इनाम से नवाजता है। इसलिए इस दिन को ईद कहते हैं और इसी बख्शीश व इनाम के दिन को ईद-उल फितर का नाम देते हैं। रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। इस पूरे माह में रोजे रखे जाते हैं। इस महीने के खत्म होते ही दसवां माह शव्वाल शुरू होता है।
इस माह की पहली चांद रात ईद की चांद रात होती है। इस रात का इंतजार वर्ष भर खास वजह से होता है, क्योंकि इस रात को दिखने वाले चांद से ही इस्लाम के बड़े त्योहार ईद-उल फितर का ऐलान होता है। इस तरह से यह चांद ईद का पैगाम लेकर आता है। इस चांद रात को अल्फा कहा जाता है। बताया कि रमजान माह के रोजे को एक फर्ज करार दिया गया है, ताकि इंसानों को भूख-प्यास का महत्व पता चले। दुनियावी मालदौलत के लिए भागदौड़ और लालच इंसान के वजूद से जुदा हो जाए और इंसान कुरआन के अनुसार अपने को ढाल लें। इसलिए रमजान का महीना इंसान को अशरफ और आला बनाने वाला है। पर अगर कोई सिर्फ अल्लाह की ही इबादत करे और उसके बंदों से मोहब्बत करने व उनकी मदद करने से हाथ खींचे तो ऐसी इबादत को इस्लाम ने खारिज किया है। क्योंकि असल में इस्लाम का पैगाम है- अगर अल्लाह की सच्ची इबादत करनी है तो उसके सभी बंदों से प्यार करो और हमेशा सबके मददगार बनो। यह इबादत ही सही इबादत है। यही नहीं, ईद की असल खुशी भी इसी में है।
नमाज से पहले अदा करें फितरा
ईद मनाने से पहले फितरा और जकात निकालना जरूरी है। फितरा गरीब और मजलूमों को दिया जाता है। जिससे वह भी ईद की खुशी में शरीक हो सके। फितरे और जकात अदा न करने से रमजान के फजाईल अधूरे रह जाते है। मालदार मुसलमान (जिसके पास साढ़े बावन तौले सोना हो) को अपनी कुल माल दौलत (जिस पर एक साल गुजर गया हो) के ढाई प्रतिशत या चालीसवा हिस्सा गरीबों में खैरात करना होता है।
नमाज के बाद देते है ईदी
ईद के दिन लोग सुबह-सुबह उठकर ईदगाहों में नमाज
पढ़ने जाते है। नमाज में सफेद कपड़े पहनना और इत्र लगाना
इस्लाम में अच्छा माना जाता है। क्योंकि सफेद रंग सादगी और पाकी का पैगात देता है। ईदगाह में पहुंचकर नमाज पढ़ने से पहले गरीबों में खैरात करते है। नमाज अदा करने के बाद सभी एक-दसूरे से गले मिलते है। ईद की बधाई देते है। अपने छोटो को कुछ रुपये भी देते है। इस रकम को ईदी कहते है।
घरों में महकेंगी लजीज व्यंजनों की खुशबू
यूं तो मीठी ईद (ईद उल फितर ) पर सिवाईयां बनाने का प्रचलन है। पर इसके अलावा और भी कई व्यंजन इस त्योहार पर बनते हैं। ईद के बाजारों में सिवइंयों के दिल लुभाते ढेरों के अलावा शीरमाल, बाकरखानी, अंगूरदाना वगैरह भी खूब बनते हैं। साथ ही घरों में मांसाहारी व्यंजन भी बनते हैं।
खरीददारों से बाजार गुलजार
ईद उल फितर पर्व की खरीददारी करने को रेलवे रोड, शुगर मिल रोड, देहरादून रोड और ऋषिकेश रोड के बाजारों में मुस्लिम लोग खरीददारी को उमड़ रहे है। कपड़ा कारोबारी कपिल अरोडा ने बताया कि युवाओं की पहली पसंद डिजाइनर कुर्ते बने है। जबकि महिलाएं भी कढ़ाई के शूट पसंद कर रही है। वहीं जूतों और सिवाईयों की दुकानों से भी भीड़ हटने का नाम नही ले रही है।
मसजिदों में हो रही तैयारी
ईद की नमाज के लिए मसजिदों में तैयारियों की जा रही है। जामा मस्जिद तेलीवाला से जुड़े हाजी अमीर हसन ने बताया कि मसजिदों में ईद की नमाज को विशेष साफ सफाई की जा रही है। क्षेत्र के कुडकावाला, भानियावाला, नगर डोईवाला की मसजिदों में भी नमाज की तैयारियां जोरों पर है।
चांद का दीदार हुआ तो ईद कल
आज रमजान का 29वीं रोजा है। आज चांद का दीदार हुआ तो कल ईद मनाई जाएगी। चांद की तस्दीक न होने पर बृहस्पतिवार को ईद मनाई जाएगी।