स्वामी चिदांनद सरस्वती से मुलाकात करते विभिन्न देशों से आए विद्यार्थी। स्रोत परमार्थ मीडिया।
परमार्थ निकेतन में देश, विदेश से आए विद्यार्थियों ने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने जीवन, पर्यावरण और आध्यात्मिकता से जुड़े अनेक विषयों पर चर्चा कर जानकारी जुटाई।
अंतरराष्ट्रीय वन दिवस पर स्वामी चिदांनद सरस्वती ने कहा कि खाया और फेंका संस्कृति मानवता और प्रकृति दोनों के लिए घातक है। युवा यूज एंड थ्रो की प्रवृत्ति को त्यागकर यूज एंड ग्रो की संस्कृति अपनाएं, जो सतत विकास और संतुलित जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। वन केवल हरियाली नहीं, बल्कि जीवन, संतुलन और साधना के आधार हैं। सनातन परंपरा में वनों को चेतना का केंद्र माना गया है, जहां ऋषि मुनियों ने तप कर मानवता को दिशा दी।
स्वामी ने सभी को संकल्प कराया कि हम अपने जन्मदिवस, पर्व और उत्सवों पर पौधारोपण करें और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं। यदि वन बचेंगे, तभी जीवन बचेगा। विश्व के अनेकों देशों से आए विद्यार्थियों ने यह केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है, जहां मां गंगा की निर्मल धारा के साथ-साथ ज्ञान, संस्कार और आत्मबोध की गंगा भी निरंतर प्रवाहित हो रही है। यहां की प्रत्येक गतिविधि केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण का माध्यम है। यह स्थान तनाव मुक्ति, आंतरिक संतुलन और अपने मूल और मूल्यों से दोबारा जुड़ने का एक अद्भुत और प्रेरणादायक केंद्र है, जो जीवन को नई दिशा और गहराई प्रदान करता है।