उनके पढ़ाई कई बच्चे सरकारी विद्यालय में ले चुके हैं प्रवेश
शिक्षक न देखे जात पात, शिक्षक न करता पक्षपात, निर्धन हो या धनवान, शिक्षक के लिए सभी एक समान, शिक्षक माझी नाव किनारा, शिक्षक डूबते का सहारा, शिक्षक का है सदा ही कहना, श्रम लगन है सच्चा गहना...., वाक्या भुवनेश्वर प्रसाद भारद्वाज पर चरितार्थ हो रहा है। भुवनेश्वर बीते छह वर्षों से गुज्जर बस्ती और लोहार के बच्चों को अक्षर ज्ञान दे रहे हैं।
सुदामा मार्ग स्थित कुमारवाड़ा निवासी भुवनेश्वर ने बताया कि शिक्षा से समुदाय, समाज, राज्य और राष्ट्र की उन्नति होती है। जंगल के बच्चों को समाज के विद्यालयों की ओर ले जाना, जंगलों में रहने वाले बच्चे हो या शहर के कोने में रहने वाले बच्चे, उनकी शिक्षा और कौशल के लिए सामग्री देना और जागरूक करना उनका लक्ष्य है।
यह लक्ष्य शिक्षा से ही प्राप्त होगा। इसके लिए उन्हें अक्षर का ज्ञान जरूरी है। पहली बार लोहार समुदाय और गुज्जर बस्ती के लोगों ने 78 सालों में स्वतंत्रता दिवस मनाया। उन्होंने बताया कि वह ऋषिकेश के एक आश्रम में प्रबंधक की नौकरी करते थे।
वर्ष 2017 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। कहा, उनका लक्ष्य समाज में कुछ अलग करना था, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे इसकी शुरूआत कहां से करें। एक बार जब उन्होंने त्रिवेणीघाट पर गंगा में ट्यूब की मदद से लकड़ियां ढो रहे बच्चों को देखा तो उनका मन इन बच्चों के लिए कुछ करने का हुआ। सबसे पहले उन्होंने इसकी शुरूआत राजाजी टाइगर रिजर्व अंतर्गत चीला-बैराज मोटर मार्ग स्थित गुज्जर बस्ती के डेरे से किया।
उन्होंने देखा कि यहां बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। फिर उन्होंने इन बच्चों को शिक्षा देने की सोची और इस मुहिम में जुट गए। वर्ष 2024 में वह लोहार समुदाय के बच्चों को भी शिक्षा दे रहे हैं। अब उनकी योजना पाथौं गांव के आसपास ऐसे बच्चों को शिक्षा देना है जो भटक रहे हैं। उन्होंने बताया कि शुरूआत में उन्होंने जिन-जिन बच्चों को पढ़ाया है, अब उनमें से कई बच्चे सरकारी विद्यालय में प्रवेश ले चुके हैं।