उच्च शिक्षा निदेशालय हल्द्वानी उच्च शिक्षा में संस्कृत के सहायक प्राध्यापकों और आचार्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में उल्टी गंगा बहा रहा है। इस पद के लिए हाल में मांगे गए आवेदनों में परंपरागत संस्कृत शिक्षा प्रणाली से आचार्य उपाधि धारक, नेट, पीएचडी होल्डरों को पात्रता के बाद भी बाहर कर दिया गया। जबकि सामान्य प्रणाली से एमए संस्कृत डिग्री धारक नेट और पीएचडी पात्रता वालों को वरीयता दे दी गई।
खास बात यह है कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) दोनों संस्कृत आचार्य को इस पद के लिए अर्ह मानते हैं।
बीते वर्ष 19 अक्तूबर 2015 को उत्तराखंड उच्च शिक्षा निदेशालय हल्द्वानी की ओर से प्रकाशित विज्ञापन में राजकीय महाविद्यालयों में विभिन्न विषयों के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर (गेस्ट फैकल्टी) के आवेदन मांगे गए। इसके लिए संस्कृत विषय के 35 पदों के लिए परंपरागत संस्कृत शिक्षा प्रणाली से आचार्य उपाधि धारकों ने भी आवेदन किया था। लेकिन संस्कृत से आचार्य उपाधि धारकों को इस पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। जबकि सामान्य शिक्षा से एमए संस्कृत वालों को योग्य मानते हुए साक्षात्कार में शामिल कर 24 दिसंबर 2015 को 30 पदों के लिए सूची जारी कर दी गई है।
अर्हता रखते हैं संस्कृत आचार्य
यूजीसी और लोक सेवा आयोग उत्तराखंड की नियमावधि भी यही कहती है। लेकिन उच्च शिक्षा निदेशालय ने परंपरागत संस्कृत पढ़ने वालों को योग्यता के बावजूद इस पद से महरूम रखा गया। यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार ने वर्ष 2010 में संस्कृत को राज्य की द्वितीय राजभाषा का बदर्जा दिया है। इसका शासनादेश जारी किया गया है। निदेशालय ने उसी संस्कृत भाषा की परंपरागत शिक्षा प्राप्त आचार्यों को संस्कृत प्राध्यापक पद के लिए अयोग्य ठहरा दिया।
केस-एक : उच्च शिक्षा निदेशालय से हमें बताया गया कि परंपरागत संस्कृत आचार्य उपाधि धारक इस नियुक्ति प्रक्रिया के योग्य नहीं हैं।
-डॉ. प्रकाश चंद्र उप्रेती, साहित्य आचार्य, नेट, पीएचडी निवासी हल्द्वानी
केस-दो : इस संबंध में उच्च शिक्षा निदेशक और उच्च शिक्षा मंत्री से मिलने पर हमें कहा गया कि यह अवसर आपके लिए नहीं है, दूसरे अवसर तलाशें।
-सुरेश चंद्र जोशी, व्याकरणाचार्य, नेट, पीएचडी अध्ययनरत, निवासी हरिद्वार
केस -तीन : मुझे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था, लेकिन यह कहकर बाहर कर दिया कि संस्कृत की आचार्य उपाधि एमए के समकक्ष नहीं है।
-दिनेश चंद्र पांडेय, साहित्य आचार्य, नेट/जेआरएफ (जूनियर रिसर्च फैलोशिप), निवासी चंपावत
केस-चार : सरकार परंपरागत संस्कृत से जुड़े लोगों से सौतेला व्यवहार कर रही है। इस पद के लिए संस्कृत आचार्य उपाधि धारक ही सर्वाधिक योग्य थे। लेकिन उन्हें कुतर्क देकर बाहर कर दिया गया।
-डॉ. नारायण प्रसाद भट्टराई, आचार्य वेद, पीएचडी, निवासी ऋषिकेश
मामला संज्ञान में आया है। उच्च शिक्षा निदेशालय का यह निर्णय बेहद आपत्तिजनक है। इस बाबत हम व्यक्तिगत तौर पर शासन को पत्र भेजकर आपत्ति दर्ज करा चुके हैं। मामले को और आगे बढ़ाया जाएगा। संस्कृत आचार्य की डिग्री स्नातकोत्तर के समकक्ष ही है। इसकी पड़ताल किए बिना उच्च शिक्षा विभाग के निर्णय को संस्कृत शिक्षा से जुड़े लोगों को हतोत्साहित करना ही माना जाएगा।
-प्रो. महावीर अग्रवाल, कुलपति उत्तराखंड संस्कृत विवि