त्रिवेणी घाट पर दिखेगा रावण दहन का भव्य नजारा
ऋषिकेश। हाथों में हुनर, दिलों में प्यार और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाने का जज्बा। मजहब भले ही अलग हो लेकिन कला की न ही कोई सरहद होती है और न ही काई धर्म। तीर्थनगरी ऋषिकेश में एक मुस्लिम परिवार छह दशक से अधिक समय से दशहरे के लिए रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले तैयार कर रहा है। वर्ष 1964 में शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी जारी है। अब परिवार की तीसरी पीढ़ी भी इस पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ाने में जुटी हुई है। आने वाले दशहरे के लिए सफीक अहमद और रफीक अहमद के परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर पुतलों को अंतिम रूप दे रहे हैं। दशहरा हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। इस पर्व के लिए रावण के पुतले तैयार करने वाले इस परिवार की कहानी हुनर और परंपरा के उस रिश्ते को दर्शाती है, जो धार्मिक पहचान से परे अपनी जगह बनाता है। छह दशक से अधिक समय से परिवार के हाथों से तैयार हो रहे पुतले हर साल विजयदशमी के उत्सव का हिस्सा बनते हैं। पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन पुतले बनाने का हुनर और परंपरा के प्रति समर्पण बरकरार है।
हर साल हुनर में कुछ नया करने की कोशिश
इन दिनों आईडीपीएल रामलीला मैदान समेत ऋषिकेश के विभिन्न स्थानों पर रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले तैयार किए जा रहे हैं। कारीगर सफीक अहमद बताते हैं कि हर साल पुतलों में कुछ नया करने का प्रयास किया जाता है ताकि दशहरा उत्सव को और आकर्षक बनाया जा सके। इस बार भी पुतलों को खास रूप देने और रावण दहन को यादगार बनाने की तैयारी चल रही है।
त्रिवेणी घाट पर 60 फीट ऊंचा होगा रावण
त्रिवेणी घाट पर इस बार 60 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया जाएगा। वहीं, कुंभकरण और मेघनाद के 50-50 फीट ऊंचे पुतले भी तैयार किए जा रहे हैं। रावण दहन के दौरान रंग-बिरंगी आतिशबाजी उत्सव की रौनक बढ़ाएगी। जैसे ही आग रावण के सिर तक पहुंचेगी, आसमान में रंग-बिरंगे विसलिंग रॉकेट दिखाई देंगे और पटाखों की गूंज के बीच आसमान रोशनी से जगमगा उठेगा। छह दशक से अधिक समय से पुतले बनाने की परंपरा निभा रहा यह परिवार अपने हुनर के जरिए दशहरे की तैयारियों में योगदान दे रहा है। तीन पीढ़ियों से जारी यह सिलसिला बताता है कि कला और हुनर को आगे बढ़ाने में मेहनत, लगन और परंपरा की अहम भूमिका होती है।
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तीन पीढ़ियों से सहेजी जा रही परंपरा
दशहरे पर पुतले बनाने का यह काम केवल रोजगार नहीं, बल्कि एक पारिवारिक परंपरा भी है। वर्ष 1964 से शुरू हुई इस विरासत को सफीक अहमद और रफीक अहमद आगे बढ़ा रहे हैं। बदलते समय के साथ पुतलों की सजावट और दहन के आकर्षण में नए प्रयोग किए जा रहे हैं, लेकिन इस पारंपरिक कला से परिवार का जुड़ाव आज भी बरकरार है।
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अलग- अलग स्थानों पर पुतलों की ऊंचाई
त्रिवेणी घाट: रावण 60 फीट, कुंभकरण 50 फीट और मेघनाद 50 फीट।
टीएचडीसी: रावण 35 फीट, कुंभकरण 30 फीट और मेघनाद 25 फीट।
चौदह बीघा: रावण 50 फीट, कुंभकरण 35 फीट और मेघनाद 30 फीट।
आईडीपीएल रामलीला मैदान: रावण का पुतला 50 फीट ऊंचा होगा।
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