ब्यूरो/अमर उजाला, ऋषिकेश। अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव में विश्व के विभिन्न देशों से योग प्रेमी योग को आत्मसात करने आए हैं। सबकी जात पात, रंग, भेद, वेशभूषा अलग-अलग है, लेकिन योग के माध्यम से सभी के दिल मिल रहे हैं। योगियों का यह महासंगम विश्व बंधुत्व और एकता का संदेश दे रहा है। यह बात परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कही।
सोमवार को परमार्थ निकेतन की ओर से आयोजित 30वें अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव के चौथे दिन की शुरुआत अमेरिका से आये योगाचार्य गुरुशब्द सिंह खालसा के कुंडलिनी साधना से हुई। गुरु शरथ जोईस ने पारंपरिक अष्टांग योग, संदीप देसाई ने अष्टांग आसन का विस्तार, अमेरिका की योगाचार्य लौरा प्लंब ने गंगा योग-सोमा फ्लो, भक्ति द पॉवर ऑफ लव, योगाचार्य गैब्रिला बोजिक, योगाचार्य मर्ट गुलर ने सूफी मेडिटेशन, एक्सेसिंग योर रेडियंट बॉडी का अभ्यास कराया।
चित्त को स्थिर और सकारात्मक बना सकते हैं
जमैका से आए संत मूजी ने कहा कि वर्तमान में रहने की कला ही ध्यान और जीवन है। मानव मस्तिष्क बादलों की तरह विचरण करता है, परंतु निरंतर अभ्यास से चित्त को स्थिर और सकारात्मक बना सकते हैं। मानव के दो चित्त होते हैं। एक चित्त जो बाहरी दुनिया को देखता है और उसमें खो जाता है। दूसरा चित्त जो शांत होता है, स्वयं का निरीक्षण करता है। स्वयं का निरीक्षण करना ही शक्तिशाली कदम है।
शून्य में लीन होना ध्यान की उत्तम अवस्था: साध्वी भगवती
अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव की निदेशक साध्वी भगवती सरस्वती ने ‘गंगा फ्लो मेडिटेशन’ सत्र में कहा कि ध्यान से तात्पर्य आपके अंदर न तो कोई विचार, न स्मृति और न मन की गति। ध्यान तो जीवन की वह अवस्था है जहां पर सब शून्य हो जाता है। ध्यान में मन खाली हो जाता है, दर्पण हो जाता है। फिर प्रभु से एकाकार हो जाता है। उन्होंने कहा कि ध्यान में बैठने की नहीं बल्कि ध्यान में होने की जरूरत है। जिस प्रकार हम अपने कार्यों को करते हुए अंदर ही अंदर अनेक विचारों में उलझे होते हैं। उन सब विचारों को बाहर कर मन को स्थिर कर विचार शून्य होना ही ध्यान है।