वर्ष 2016 बीतने को है, लेकिन जिले की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की कोई पहल नहीं हो पाई। डॉक्टरों के रिक्त पद भरने की मांग को लेकर कई बार आंदोलन हुए। जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत की बैठकों में स्वास्थ्य का मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। अस्कोट के अस्पताल में डॉक्टर की तैनाती की मांग को लेकर विधायक तक को धरने पर बैठना पड़ा, लेकिन वहां अब तक भी डॉक्टर की तैनाती नहीं हो पाई है। सबसे बड़ी समस्या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में है। यहां मानक के अनुसार डॉक्टर तैनात नहीं हैं। अधिकांश स्वास्थ्य केंद्रों को एक-एक डॉक्टर ही संचालित कर रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलेगा कि जिले में डॉक्टरों के कई पद रिक्त हैं। श्रेणी ग में (जिसमें वरिष्ठ और विशेषज्ञ डॉक्टर आते हैं) उनके कुल 23 पद जिले में सृजित हैं, लेकिन इस समय श्रेणी ग के 11 पद रिक्त चल रहे हैं। इसी तरह श्रेणी ख (जिसमें एमबीबीएस स्तर के डॉक्टर आते हैं) उनके 166 पद सृजित हैं, लेकिन मात्र 59 डॉक्टर ही इस समय काम कर रहे हैं। एमबीबीएस स्तर के 107 डॉक्टरों के पद इस जिले में रिक्त हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से हर महीने डॉक्टरों के रिक्त पदों की सूची महानिदेशालय को भेजी जाती है, लेकिन नए डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं हो रही है। सीएमओ डा. यूएस अधिकारी का कहना है कि रिक्त पदों की डिमांड हर महीने भेजी जाती है। जिले में हाल के दिनों में किसी नए डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई।
हर अस्पताल में डॉक्टरों की कमी
पिथौरागढ़ जिले में इस समय चार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, चार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 32 एलोपैथिक अस्पताल, एक जिला अस्पताल, एक जिला महिला अस्पताल, एक टीबी अस्पताल, थल और बेड़ीनाग में ग्रामीण महिला अस्पताल संचालित हो रहे हैं। सभी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी है। जैसे-तैसे इन अस्पतालों का संचालन हो रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं को नजरअंदाज किया
जिला अधिवक्ता संस्था के अध्यक्ष मोहन चंद्र भट्ट का कहना है कि सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को नजरअंदाज किया है। पिथौरागढ़ जिला अस्पताल पर पूरे जिले के साथ-साथ नेपाल का भी दबाव है, लेकिन यहां पर सुविधाएं कुछ नहीं हैं। नए साल में सरकार को कम से कम डॉक्टरों के रिक्त पद भरने पर ध्यान देना चाहिए।
गरीब जनता को मुसीबत में न डाला जाए
व्यापार संघ के नगर अध्यक्ष शमशेर महर का कहना है कि स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने से सबसे ज्यादा दिक्कत गरीब जनता को आती है। वह कहते हैं कि हर अस्पताल रेफर सेंटर बन गया है। ग्रामीण अस्पतालों से जिला अस्पताल और जिला अस्पताल से हल्द्वानी या बरेली को रेफर करने की परंपरा सी बन गई है।