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यारसागंबू दोहन क्षेत्र को आग से बचाया जाए

Fri, 14 Apr 2017 10:43 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
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यारसागंबू - फोटो : अमर उजाला
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मुनस्यारी तहसील के गांवों में यारसागंबू के दोहन के तरीकों को समझाने के लिए आयोजित बैठकों में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पिथौरागढ़ के जंतु विज्ञान विभाग के शोधार्थियों ने कहा कि दोहन वाले क्षेत्र को आग से बचाना बेहद जरूरी है। आग से यारसागंबू के लार्वा को नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा लोगों को यह सुझाव दिया गया कि दोहन के लिए लोगों की संख्या को सीमित किया जाए।
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जंतु विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डा. सीएस नेगी के निर्देशन में शोधकार्य कर रहे प्रदीप शर्मा और नरेंद्र सिंह ने साईपोलू, बुई, पातो, ढीलम, कुलथम, उछैती, जीआईसी मदकोट में चलाए गए जागरूकता अभियान के दौरान कहा कि यारसागंबू की उपज हर साल कम हो रही है। यह अच्छा संकेत नहीं है। इस स्थिति पर नियंत्रण के लिए सुझाव दिया गया कि हर ग्राम पंचायत को अपने स्तर से नियम बनाने होंगे और हर साल सीमित संख्या में ही लोगों को बुग्यालों में भेजना होगा। अपरिपक्व यारसागंबू को न निकालने के लिए कहा गया। यह कोशिश की जाए कि कुछ लार्वा जमीन के अंदर संरक्षित रहें, ताकि वह अगले साल परिपक्व हो सकें।

यारसागंबू के लिए आग को सबसे घातक बताते हुए कहा गया कि आग से घास जल जाती है और लार्वा को तैयार करने वाले कीट का भोजन समाप्त हो जाता है। बुग्यालों से भेड़, बकरी तथा अन्य जानवरों को दूर रखने की अपील करते हुए कहा गया कि जानवरों की आवाजाही से मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण दोनों पर असर पड़ता है। यारसागंबू चूंकि बेहद संवेदनशील किस्म का लार्वा है। इस पर पर्यावरण प्रदूषण का असर बहुत जल्दी पड़ता है। अब शोधार्थियों का दल शनिवार से धारचूला तहसील के गांवों में जागरूकता अभियान चलाएगा।
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व्यापार के लिए नेपाल पर निर्भरता
शोधार्थी प्रदीप शर्मा और नरेंद्र सिंह का कहना है कि यह दुर्भाग्य की बात है कि अब तक प्रदेश में यारसागंबू के मार्केटिंग की कोई नीति नहीं बन पाई है। यारसागंबू का संग्रह करने वालों को सिर्फ नेपाल के व्यापारियों और तस्करों के भरोसे रहना पड़ता है। यारसागंबू संग्रह करने वालों को इसी कारण कम दाम में यह सामग्री बेचनी पड़ती है। नेपाल के व्यापारी यारसागंबू को ऊंचे दामों पर चीन पहुंचा देते हैं।
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