समुद्र सतह से 6191 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ऊं पर्वत पर भी इस बार मौसम का असर पड़ा है। इस बार कम हिमपात के कारण ऊं पर्वत भी संकट में है। यदि जल्द हिमपात नहीं हुआ तो कैलास मानसरोवर यात्री ऊं पर्वत के अद्भुत दृश्य को देखने से वंचित रह जाएंगे। छोटा कैलास मार्ग पर स्थित ऊं पर्वत ज्योलिंगकांग के पास है। इसी के नजदीक पार्वती सरोवर भी है। अप्रैल 2004 से छोटा कैलास की यात्रा शुरू हुई। तभी से ऊं पर्वत का महत्व भी बढ़ गया।
ऊं पर्वत पर ऊं अक्षर प्राकृतिक रूप से उभरा है। ज्यादा हिमपात होने पर प्राकृति रूप से ऊभरा यह ऊं अक्षर चमकता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। इस बार फरवरी का पहला हफ्ता बीतने को है, लेकिन ऊंची चोटियों पर जमकर हिमपात नहीं हो पाया है। ऊं पर्वत में बहुत कम बर्फ रह गई है। स्थानीय ट्रैकरों और प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि यदि आने वाले महीनों में ठीकठाक हिमपात नहीं हुआ तो ऊं पर्वत के वास्तविक स्वरूप को देखने से यात्री वंचित रह जाएंगे। इससे पहले भी ऐसी स्थितियां सामने आ चुकी हैं। 2008 में कम हिमपात के कारण ऊं पर्वत का वास्तविक स्वरूप नजर नहीं आया। 2011 में भी कम हिमपात हुआ था और जून में शुरू होने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा तक ऊं पर्वत में नाममात्र की बर्फ रह गई थी।
बता दें कि ऊं पर्वत का पर्यटन की दृष्टि से बड़ा महत्व है। इस इलाके में जाने वाले पर्यटकों और ट्रैकरों के लिए यही एकमात्र आकर्षण का केंद्र है। कैलास मानसरोवर यात्री भी ऊं पर्वत को देखने को लालायित रहते हैं। ऊं पर्वत का महत्व कैलास पर्वत की तरह ही आंका गया है, जो लोग कैलास मानसरोवर की यात्रा नहीं कर पाते वह छोटा कैलास के दर्शन कर संतुष्ट हो जाते हैं।
स्थानीय लोगों की उम्मीद बरकरार
स्थानीय लोगों का कहना है कि सर्दियों में यदि कम हिमपात हुआ तो मार्च में भी जमकर हिमपात की संभावना रहती है। उनका मानना है कि मार्च में यदि हिमपात हुआ तो ऊं पर्वत बर्फ से भर जाएगा। व्यापार संघ अध्यक्ष भूपेंद्र थापा, समाजसेवी शकुंतला दताल आदि का कहना है कि अभी से निराश होने के बजाय इंतजार करना चाहिए। मौसम जरूर करवट लेगा और हिमपात होगा।