बलतिर गांव की नहर में जोड़े गए प्लास्टिक के पाइप
- फोटो : अमर उजाला
भेरियागाड़ से बलतिर की 80 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के लिए बनी नहर की 14 महीने बाद भी विभाग मरम्मत नहीं कर पाया है। अब गांव के लोगों ने नहर में प्लास्टिक के पाइप डालकर खेतों तक पानी पहुंचाने का प्रयास किया है। नहर कई स्थानों पर टूट गई है। इस कारण खेतों तक जरूरत के हिसाब से पानी नहीं पहुंच पा रहा है। गांव के लोग लघु सिंचाई विभाग के रवैये से खासे नाराज हैं।
बताया गया कि बलतिर गांव की उपजाऊ जमीन को सिंचित करने के लिए 1965 में इस नहर का निर्माण किया गया। 2003 में नहर की देखरेख का दायित्व लघु सिंचाई विभाग को सौंपा गया। तब से नहर की हालत बिगड़ती चली गई। गांव के लोगों ने बताया कि 80 हेक्टेयर जमीन में रोपाई लगाने और गेहूं बोते समय भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। हर फसल की बुआई से पहले नहर के मूल स्रोत में 40 फीट हिस्से में प्लास्टिक के पाइप गांव के लोग अपने खर्च से डालते हैं। इतने प्रयास के बाद भी खेतों तक पूरा नहीं पहुंच पाता।
लोगों का कहना है कि विभाग सिंचाई नहर के नाम पर हमेशा टैक्स की वसूली करता रहता है, लेकिन सुविधा कुछ नहीं मिलती। लघु सिंचाई विभाग के जूनियर इंजीनियर रवींद्र कुमार ने बताया कि नहर की मरम्मत के लिए जिला प्लान में प्रस्ताव दिया गया है और इस नहर को प्रधानमंत्री सिंचाई योजना में शामिल करने की तैयारी चल रही है।
यह किसानों के साथ अन्याय
बलतिर निवासी गोपाल सिंह नेवे का कहना है कि सरकार किसानों के साथ अन्याय कर रही है। एक तरफ खेती को बढ़ावा देने की बात की जाती है दूसरी तरफ नहरों के हाल ऐसे हैं। उन्होंने कहा कि ढाई किलोमीटर लंबी इस नहर की मरम्मत विभाग 14 महीने से नहीं कर पाया है। गांव के लोगों को श्रमदान से नहर चलानी पड़ती है।
मरम्मत के लिए कई बार पत्र भेजे
ग्राम प्रधान महिराज भैंसोड़ा का कहना है कि नहर की मरम्मत के लिए विभाग को कम से कम 20 पत्र दे दिए हैं। अब तक नहर की मरम्मत की कोशिश नहीं की गई। विभाग के अधिकारी सिर्फ सर्वे करने के बाद चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि विभाग को किसानों को मुआवजा देना चाहिए। क्योंकि हर बार पानी की कमी से फसल खराब हो रही है।