पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यादें टनकपुर से भी जुड़ी हैं। वर्ष 1981 में पिथौरागढ़ जाते वक्त टनकपुर में रुके पूर्व प्रधानमंत्री को न चाहते हुए भी भीड़ बढ़ने पर जनसभा भी करनी पड़ी थी। उन्होंने टनकपुर को मानसरोवर यात्रा का प्रवेश द्वार बताते हुए मां पूर्णागिरि धाम के विकास पर जोर दिया था।
जनसंघ से जुड़े 80 वर्षीय तत्कालीन भाजपा के नगर महामंत्री रहे मदन मोहन अग्रवाल ने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का नवंबर 1981 में पिथौरागढ़ में कार्यक्रम था। वे पिथौरागढ़ जाने के लिए कार से 9 नवंबर को टनकपुर आए थे। उन्होंने एक रात यहां सिंचाई विभाग के विश्राम गृह में गुजारी थी। यहां आने पर अटल जी ने पहले ही जनसभा न करने और सिर्फ रात्रि विश्राम कर पिथौरागढ़ को जाने की इच्छा जताई थी।
कार्यकर्ता उनके कार्यक्रम का लोगों को आमंत्रण पत्र बांट चुके थे। वाजपेयी जी को सुनने के लिए लोगों की इतनी भीड़ लग गई कि न चाहते हुए भी उन्हें जनसभा करनी पड़ी। उन्होंने बताया कि अटल जी ने कहा था कि जिस तरह हरिद्वार को चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार माना जाता है, उसी तरह टनकपुर भी कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रवेश द्वार है। उन्होंने मां पूर्णागिरि धाम को भी सुविधाओं के लिहाज से विकसित करने पर जोर दिया था।
मायावती आश्रम के दर्शन की हसरत नहीं हुई पूरी
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी टनकपुर से होते हुए 10 नवंबर 1981 को सड़क मार्ग से चंपावत और लोहाघाट पहुंचे। दोनों जगहों पर जनसभाएं हुई, मगर उनकी लोहाघाट के पास मायावती अद्वैत आश्रम के दर्शन करने की हसरत अधूरी रही। पूर्व विधायक और भाजपा नेता केसी पुनेठा बताते हैं कि लोहाघाट में वक्त कम होने से वे मायावती आश्रम नहीं जा सके, लेकिन दोबारा यहां आने पर मायावती आश्रम आने की बात कह गए थे, मगर दोबारा नहीं आए।
10 नवंबर को चंपावत मोटर स्टेशन और लोहाघाट के रामलीला मैदान में डेढ़ साल पहले स्थापित पार्टी के संगठन को मजबूत करने का वे आह्वान कर गए। चंपावत में अमरनाथ वर्मा, श्याम नारायण पांडेय, जगदीश जोशी, दिलीप सिंह मेहता सहित कई नेताओं ने उनकी अगवानी की थी।
बताते हैं कि उनकी ओजपूर्ण वाणी के आम लोग भी कायल हुए। लोहाघाट में स्टेशन से खड़ी बाजार होते हुए जुलूस की शक्ल में रामलीला मैदान पहुंचे। तब भाजयुमो के तत्कालीन जिला महामंत्री और पूर्व विधायक केसी पुनेठा ने कार्यक्रम की कमान संभाली थी। बताते हैं कि लोहाघाट की खूबसूरती पर वे खासे फिदा थे। जनसभा के बाद वाजपेयी स्वामी विवेकानंद पुस्तकालय गए थे।