इसे सरकारी तंत्र की मनमानी ही कहा जाएगा कि थल बाजार के कुछ हिस्से और सत्यालगांव के 350 परिवारों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए नैनादेवी गधेरे से तीन पेयजल योजनाएं तो बना दी, लेकिन इन तीनों योजनाओं में पानी नहीं चलता। नैनादेवी के मुख्य स्रोत से पानी नहीं आता और पेयजल लाइन भी जगह-जगह टूट गई है।
सबसे पहले 1982 में नैनादेवी-सत्यालगांव नाम से पेयजल योजना का निर्माण हुआ। कुछ समय तक योजना ठीक चली लेकिन जब इसमें पानी कम होने लगा तो जल निगम ने 1998 में नई पेयजल योजना का प्रस्ताव तैयार किया। नई योजना भी नैनादेवी गधेरे से ही तैयार की गई थी। इससे पुरानी पेयजल योजना खतरे में आ गई। जब दोनों पेयजल योजनाओं का दम निकल गया तो विभाग ने 2001 में फिर से एक पेयजल योजना इसी गधेरे से बना डाली।
आज स्थिति यह है कि तीनों पेयजल योजनाओं में पानी नहीं आता। लोगों को गांव के लिए तीन योजनाएं होने के बाद भी प्राकृतिक स्रोतों की शरण में जाना पड़ता है। लोगों का कहना है कि योजनाओं का निर्माण जनता को सुविधा देने के लिए नहीं वरन धन खपाने के लिए किया गया।
ऐसे मामलों की जांच होनी चाहिए
सत्यालगांव निवासी हीरा देवी का कहना है कि सरकारी धन का दुरुपयोग करने वालों की जांच होनी चाहिए। वह कहती हैं कि गांव के लोगों को योजना नहीं पानी चाहिए। तीन योजनाओं में पानी नहीं चलता। लोगों को प्राकृतिक स्रोतों के सहारे रहना पड़ता है। गांव के लोगों को पानी मिलना चाहिए।
कभी शुद्ध पेयजल नहीं मिला
थल निवासी बेला देवी का कहना है कि पहले जब योजनाओं से पानी चलता था तब भी लोगों को साफ पानी नहीं मिल पाया। नैनादेवी के स्रोत के नाम पर बनी इस योजना का पानी गंदे गधेरे से टेप कर दिया गया है। लोग पहले भी इस पानी का उपयोग नहीं करते थे। अब तो योजनाओं में पानी ही नहीं आता।