बृहस्पतिवार की अर्द्धरात्रि और शुक्रवार सुबह आसमानी आफत ने दर्जनों लोगों और उनके घरों को जमींदोज कर डाला। लोगों के नाते, रिश्तेदार आपदा की भेंट चढ़ गए। यह लोग कई दशकों से आपदा की मार झेल रहे हैं। प्रकृति ने एक दिन पहले खतरे का अहसास करा दिया था। रामगंगा और गोरी नदी उफान पर थी, पेड़, बोल्डर, मलबा अपने साथ बहाकर चल रही थी, लेकिन नदियों के खतरे के निशान से ऊपर बहने को गंभीरता से नहीं लिया गया। कोई अलर्ट तक जारी नहीं किया गया।
वर्ष 2013 का जलप्रलय कोई भूला नहीं है। उस बार भी आपदा की आहट का संकेत हमारी नदियों ने दिया था। नामिक से निकलने वाली रामगंगा उस साल जून के पहले सप्ताह में पेड़, बोल्डरों को अपने साथ बहाकर ला रही थी। हजारों मरी मछलियां नदी तट पर बिखरी थी। कुछ दिन बाद 16, 17 जून 2013 के जलप्रलय का मंजर सबने देखा।
यही संकेत इस बार भी प्रकृति ने दे दिया था। रामगंगा कई दिनों से उफान पर थी। मिलम से निकलने वाली गोरी नदी ने विकराल रूप धारण कर लिया था। नदी तट की जमीन पानी से पट गई। 30 जून को गोरी नदी की विकरालता को देख किसी अनहोनी की आशंका पैदा हो गई थी। यह आशंका एक जून को बस्तड़ी, नाचनी के नौलड़ा समेत तमाम स्थानों में दिखी, लेकिन अफसोस आपदा प्रबंधन विभाग ने न तो नदियों का संकेत समझा, न ही लोगों को इसके खतरे से अवगत करा पाया।
वास्तविक ड्रिल में कहीं नहीं टिकता तंत्र
बरसात का सीजन आने से पहले इस जिले में भारी रकम खर्च कर भूकंप, आपदा का मॉकड्रिल करने का रिवाज सा बना लिया गया है, लेकिन बात जब वास्तविक ड्रिल की आती है तो ये तंत्र बेहद बेबस और लाचार नजर आता है। बस्तड़ी के मामले में भी यही हुआ। सड़क, संचार व्यवस्था पुख्ता होती तो कई की जिंदगी बच सकती थी। बस्तड़ी हादसे के प्रत्यक्षदर्शी कृष्णानंद भट्ट बताते हैं कि गांव का होनहार युवा रवींद्र भट्ट (38) मलबे में दबा था। गांव के लोगों ने उसे निकाला, लेकिन उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। क्योंकि समय पर मदद नहीं मिली। शुक्रवार सुबह 6.30 बजे हादसा हुआ। 9.30 बजे सबसे पहले सेना पहुंची। बस्तड़ी गांव में अपने मित्र के यहां आए नारायणनगर निवासी अर्जुन कन्याल ने सरकारी तंत्र की लापरवाही पर सवाल खड़े करते हुए बताया कि जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी का मोबाइल फोन घटना के दिन सुबह 8 बजे तक स्विच आफ था। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी और जिला प्रशासन दोपहर 3 बजे बाद गांव में पहुंचा।
आपदा पिथौरागढ़ में और एनडीआरएफ अल्मोड़ा में
पिथौरागढ़ जिला आपदा की दृष्टि से प्रदेश में अति संवेदनशील स्थानों पर शुमार है। हर साल बरसात की आपदा यहां कई जिंदगियों को लीलती है, लेकिन हमारी सरकार और उसका तंत्र कितने संवेदनशील है, इसका नजारा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ) की टीम पिथौरागढ़ जिला में रखने के स्थान पर 100 किमी दूर अल्मोड़ा में रखी गई थी। बस्तड़ी के हादसे के बाद टीम अल्मोड़ा से रवाना हुई। शुक्रवार देर शाम एनडीआरएफ की टीम घटनास्थल पर पहुंची। हाल में मुख्यमंत्री की वीडियो कांफ्रेंसिंग में एक आला अधिकारी ने एनडीआरएफ की टीम को अल्मोड़ा के स्थान पर डीडीहाट में रखने की बात उठाई थी, लेकिन इसको हल्के में लिया गया।