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महिला प्रधानों के सभी काम पतियाें के करने की परंपरा गलत

Tue, 07 Mar 2017 10:05 PM IST
केबी पाल/अमर उजाला, अस्कोट
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हिनकोट की प्रधान शहनाज बेगम - फोटो : अमर उजाला
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सिर्फ हाईस्कूल तक पढ़ी हिनकोट ग्राम पंचायत की प्रधान शहनाज बेहतर ढंग से गांव की व्यवस्था चला रही है। अल्पसंख्यकों के सिर्फ 13 परिवारों वाले गांव की प्रधान बनकर शहनाज ने भाईचारे की मिसाल कायम कर दी। उन्होंने गांव में किसी प्रकार का भेदभाव धर्म के आधार पर नहीं होने दिया। वह महिला प्रधानों के सारे काम उनके पति द्वारा ही निपटाने की परंपरा को गलत मानती हैं।
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जून 2014 में जब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से ठीक पहले यहां की हिनकोट ग्राम पंचायत में प्रधान का पद अल्पसंख्यक वर्ग की महिला के लिए आरक्षित हुआ तो उस समय गांव के लोग असमंजस में आ गए। लोगों के आग्रह पर शहनाज ने प्रधान पद का चुनाव लड़ने का आग्रह मंजूर कर लिया। यह बात अलग है कि उनके विरोध में बाद में दूसरी महिला ने भी नामांकन पत्र भरा। चुनाव हुआ और शहनाज हिनकोट ग्राम पंचायत की प्रधान बन गई। सिर्फ हाईस्कूल तक पढ़ी शहनाज को उससे पहले ग्राम पंचायतों की व्यवस्था के संचालन का कोई अनुभव नहीं था। उनको लगा कि इतना जिम्मेदारी वाला पद कैसे संभालेंगी। एक अल्पसंख्यक महिला को गांव की व्यवस्था का संचालन करना था। गांव में 35 परिवार सामान्य वर्ग के रहते हैं।

शहनाज कहती हैं कि गांव के लोगों ने उनको जो दायित्व दिया है, उसका निर्वाह सही ढंग से किया जाना जरूरी है। 32 वर्षीय शहनाज ने बताया कि ब्लॉक कार्यालय से विकास की योजनाओं को बांटते समय समानता होनी चाहिए। तभी गांव का समग्र विकास हो सकता है। उन्होंने अब तक गांव में रास्तों का निर्माण कराया है। हर परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, इसके लिए वह सजग रहती हैं। गांव के गरीबों को आवास दिलाने, वृद्धावस्था पेंशन दिलाने के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किए और कामयाबी भी मिली है। शहनाज कहती हैं कि महिलाओं को प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य चुने जाने के बाद पुरुषों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। शहनाज का कहना है कि वह सारा काम खुद करती हैं। पति पर कम से कम प्रधान वाले काम के लिए निर्भर नहीं रहती।
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