मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं। हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि 18 साल में 102 परिवार अस्कोट के जेठीगांव को छोड़कर जा चुके हैं। यह गांव वर्ष 1998 से पलायन की मार झेल रहा है। यदि अब भी सरकारें नहीं चेती तो हालात और खराब हो सकते हैं।
कभी 152 परिवारों से गुलजार रहने वाला जेठीगांव तेजी से खाली होते गांवों की सूची में शामिल हो गया है। गांव में अब मात्र 50 परिवार रह गए हैं। जमन सिंह जेठी, मोहन सिंह जेठी, नंदन सिंह, राम सिंह, गोविंद सिंह, लाल सिंह, दीवान सिंह, दान सिंह, गोपाल सिंह, शोबन सिंह, त्रिलोक सिंह, प्रताप सिंह वह नाम हैं जो अपने परिवार के साथ अपने पुरुखों की माटी को छोड़कर जा चुके हैं।
लोगों के गांव छोड़ने का क्रम वर्ष 2006 में मोटर सड़क बनने के बाद भी नहीं थमा। गांव के लोग एक-एक कर पिथौरागढ़, हल्द्वानी, नैनीताल या फिर तराई जाकर बस रहे हैं। सरकारी तंत्र न तो पलायन की तह पर जाने को तैयार है, न उसका कोई ठोस उपाय ही ढूंढ रहा है। गांव के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा रोजगार के साधन उपलब्ध कराने होंगे। पहाड़ की अकूत जल, वन, खनिज संपदा के साथ ही धार्मिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन से यहां के लोगों के दिन बहुर सकते हैं।
आश्वासनों पर नहीं रह गया विश्वास
प्रधान कलावती देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य गोविंदी देवी, पूर्व प्रधान खड़क सिंह जेठी, ग्रामीण बसंती देवी, हीरा देवी कहती हैं कि सरकार और राजनेताओं के आश्वासनों पर विश्वास नहीं रह गया है। लोग अभावों के बावजूद अपनी माटी से प्रेम के कारण गांव में रहना चाहते हैं। गांव में बहने वाले नालों से भूकटाव होता है। बंदर, सुअर खेती उजाड़ दे रहे हैं। सरकार इस पर रोक नहीं लगा पा रही है और सुविधा क्या देगी।