डीडीहाट में जनता के दर्शन के लिए रखा गया सेनानी देव सिंह डसीला का पार्थिव शरीर
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देव सिंह डसीला के पार्थिव शरीर को बृहस्पतिवार को जनता के अंतिम दर्शन के लिए सुभाष चौक और उनके आवास पर रखा गया। तहसीलदार ने सेनानी के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लिपटाया। इस दौरान जन प्रतिनिधियों, विभिन्न सामाजिक संगठनों, स्कूली बच्चों ने सेनानी के अंतिम दर्शन किए। शुक्रवार सुबह थल रामगंगा तट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
डीडीहाट के हाटथर्प ग्राम पंचायत के कोली गांव निवासी सेनानी देव सिंह डसीला का बुधवार रात निधन हो गया था। डसीला ने आजाद हिंद फौज में रहते हुए देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी। बृहस्पतिवार सुबह तहसीलदार एमसी पालीवाल ने उनके आवास पर पहुंचकर पार्थिव शरीर को तिरंगे से ढका। इसके बाद अभिलाषा एकेडमी के बच्चों ने पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। व्यापार संघ अध्यक्ष गोविंद लाल साह ने बताया कि शुक्रवार सुबह आठ बजे अंत्येष्टि के लिए पार्थिव शरीर थल के रामगंगा तट पर ले जाया गया।
इस दौरान डीडीहाट में बाजार बंद रहेगी। सेनानी के निधन के बाद उनकी पत्नी डिगरी देवी, पुत्र जीवन सिंह और पोता महेश डसीला बेहद गमगीन हैं। श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में पूर्व सैनिक संगठन के धन सिंह कफलिया, महेश चंद्र पंत, पालिकाध्यक्ष कमला चुफाल, वार्ड सभासद, युवा शक्ति संगठन, यूथ सोसायटी के प्रकाश बोरा, संजू पंत आदि शामिल थे।
डीडीहाट को जिला बनते देखने की अधूरी रह गई आस
डीडीहाट (पिथौरागढ़)। आजाद हिंद फौज के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.देव सिंह डसीला ने स्थानीय लोगों के साथ डीडीहाट जिले की मांग को लेकर लंबा संघर्ष किया था। क्षेत्र के विकास के लिए स्व.डसीला आंदोलनकारियों के साथ हमेशा कदम से कदम मिलाकर चले, लेकिन डीडीहाट को जिला बनते देखने की उनकी आस अधूरी रह गई। देश की आजादी के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वाले देव सिंह डसीला का संघर्ष आजादी के बाद भी नहीं रुका। देव सिंह ने डीडीहाट में कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। डीडीहाट जिले की मांग को लेकर हाल ही में चले आंदोलन में उन्होंने भी क्षेत्रवासियों के साथ अनशन किया था। उन्होंने शीघ्र जिला गठित नहीं होने पर आमरण अनशन शुरू करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिन इस बीच अस्वस्थ होने के कारण वे आंदोलन शुरू नहीं कर सके। सेनानी स्व.डसीला मौजूदा राजनीति से बेहद नाराज रहते थे। बातचीत में अक्सर वे कहा करते थे कि उन जैसे हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने गोरों के खिलाफ चली लड़ाई में जंगलों में भूखा रहकर और जेलों में अंग्रेजों की यातनाएं सहकर इस देश को आजादी दिलाई। आजादी के समय हर एक सेनानी में एक खुशी और उल्लास था। उस समय लगता था कि अब आजाद भारत में भुखमरी, बेरोजगारी जैसी समस्याएं पैदा नहीं होंगी। लेकिन आज विकास योजनाएं भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है।