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बांध की भेंट चढ़ जाएंगी बेशकीमती जड़ी-बूटियां

Sat, 07 Oct 2017 11:16 PM IST
केबी पाल/अमर उजाला, अस्कोट
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नागकेसर का पेड़, यह भी डूब क्षेत्र में आ रहे हैं - फोटो : अमर उजाला
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पंचेश्वर बांध परियोजना से खेत, खलिहान, गांवों को तो नुकसान पहुंचेगा ही, पहाड़ के लोगों के लिए जीवनदायिनी मानी जाने वाली नाना प्रकार की जड़ी-बूटियां भी बांध की भेंट चढ़ जाएंगी। महाकाली नदी क्षेत्र में नागकेशर, जंगली हल्दी, गिलोय, जामुन आदि बहुमूल्य जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं।
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महाकाली के किनारे बगड़ीहाट, तीतरी, गुर्जीगाड़, स्यालतड़, ड्योड़ा, सुनखोली समेत कई इलाकों में जड़ी-बूटियों की भरमार है। नदी से सटे इलाकों में नागकेशर, देसी खीरा, तेजपत्ता, बेलपत्री, गिलोई, त्रिफला चूर्ण बनाने के काम आने वाला आंवला, हरड़, बरड़ बहुतायत में पाया जाता है। स्थानीय लोग इन जड़ी-बूटियों से उपचार करते हैं। तेजपत्ता आदि घाटी क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार का जरिया बना है। अपनी माटी से अलग होने की आशंका से घिरे नदी क्षेत्र के लोगों को अपनी संस्कृति, सभ्यता के साथ ही बेशकीमती जड़ी-बूटियों से भी दूर होने का दुख सता रहा है। लोग चाहते हैं कि जड़ी-बूटियों के नुकसान की भरपाई के लिए सरकार योजना सामने लाए।

बात इन जीवनदायिनी जड़ी-बूटियों के गुणों की करें तो आयुर्वेदिक चिकित्सक डमर सिंह बोनाल बताते हैं कि नागकेशर टाइफाइड की बीमारी में रामबाण का काम करता है। जंगली हल्दी से सांस की बीमारी और खांसी दूर होती है। गिलोय से बुखार ठीक होता है। जामुन शुगर में कारगर है। तेजपत्ता भूख बढ़ाता है। देसी खीरा मूत्र संबंधी बीमारी को दूर करने में काम आता है।
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प्रतिपूर्ति के लिए ठोस नीति सामने आए
बुजुर्ग कृष्ण बहादुर पाल, धरम धामी कहते हैं कि इन जड़ी-बूटियों का उपयोग स्थानीय लोग सदियों से करते आ रहे हैं। जड़ी-बूटी से स्थानीय लोगों का रोजगार जुड़ा है। इसका विकल्प सरकार को ढूंढना होगा। कहते हैं कि जड़ी-बूटियों की प्रतिपूर्ति के लिए ठोस नीति सामने आनी चाहिए।
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