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नहीं मिले शव तो पुतलों की कर दी अंत्येष्टि

Sat, 09 Jul 2016 09:58 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट
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लापता लोगों के पुतलों का दाह संस्कार - फोटो : अमर उजाला
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बस्तड़ी में शनिवार सुबह बेहद मार्मिक माहौल हो गया। 30 जून की रात आपदा के समय लापता हुए नौ लोगों की खोजबीन के सारे प्रयास विफल होने के बाद गांव के लोगों ने तय किया कि अब सभी लापता लोगों के पुतले बनाए जाएं और उनका अंतिम संस्कार किया जाए। क्योंकि हिंदू रीति के अनुसार हर मृतक का अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म किया जाना जरूरी होता है। इसके लिए पंडितों ने विभिन्न धर्मग्रंथों में दिए गए नियमों को आधार मानते हुए कहा कि सभी लापता लोगों के पुतले बनाए जाएं। इसके लिए शनिवार का दिन इसलिए चुना गया कि नवें दिन के बाद क्रियाकर्म संभव नहीं होता।
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शनिवार सुबह जब लापता नौ लोगों के पुतले तैयार किए गए तो ऐसा लगा कि जैसे गांव में नई आपदा आ गई हो। इस मलबे में अब जिंदगी के निशान तलाशना संभव नहीं रह गया है। पुतले कांस (कुश) घास के बनाए गए। सभी पुतलों को लाल कपड़े में लपेटा गया। उनकी अर्थी बनाई गई। उसके बाद सभी पुतलों को चर्मा घाट तक ले जाया गया। वहां पर छह वयस्क लोगों के पुतलों की तो सामूहिक रूप से चिता जली और तीन नाबालिगों के पुतलों को दफना दिया गया। इस प्रक्रिया को संपन्न करा रहे पंडित शंकर दत्त भट्ट ने कहा कि अब मलबे से किसी के जीवित बचे होने की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि शनिवार को घटना को नौ दिन हो गए हैं। तीन दिन तक इन लापता लोगों के परिजन क्रियाकर्म करेंगे और आत्मा की शांति की प्रार्थना करेंगे।

जिन लापता लोगों के पुतलों की चिता जली, उनमें माया दत्त (40) पुत्र मुरलीधर, कृष्णानंद (36) पुत्र डिगरदेव, जीवन चंद्र (61) पुत्र चंद्रबल्लभ, गिरीश चंद्र (27) पुत्र रामदत्त, रमा देवी (80) पत्नी हरीदत्त और सरस्वती देवी (60) पुत्री हरी दत्त शामिल थे, जिन नाबालिगों के पुतलों को दफनाया गया, उनमें खुशी (10) पुत्री कृष्णानंद, आर्यन (8) पुत्र कृष्णानंद, गौरव (16) पुत्र मोहन चंद्र शामिल थे। पुतले तैयार करने का काम सिंघाली में राहत कैंपों में ही किया गया। वहां से लोग इन पुतलों को चर्मा घाट ले गए। धर्म और नियम की इस बाध्यता ने लोगों को एक बार फिर से झकझोर कर रख दिया। अब जब प्रतीकात्मक रूप से अंत्येष्टि के बाद क्रियाकर्म होने लगा है तो किसी के जिंदा वापस आने की उम्मीद लोग पूरी तरह छोड़ चुके हैं।
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निर्णय सिंधु में दी गई है यह व्यवस्था
पिथौरागढ़। कर्मकांडी पंडित आनंदबल्लभ जोशी का कहना है कि निर्णय सिंधु पुस्तक में यह व्यवस्था दी गई है कि यदि कोई व्यक्ति लापता हो जाता है और उसके जीवित बचे होने की संभावना न हो तो उसका पहले प्रतीकात्मक रूप से अंतिम संस्कार और बाद में क्रियाकर्म किया जाता है। बिना अंत्येष्टि के क्रियाकर्म नहीं हो सकता।

बस्तड़ी में 23 लोगों की गई जान
बस्तड़ी/डीडीहाट। बस्तड़ी की आपदा में 23 लोगों की जान गई, जिन 11 लोगों के शव अब तक मिले थे, उनका क्रियाकर्म चल रहा है। नौ लोगों की शनिवार को प्रतीकात्मक रूप से अंत्येष्टि हुई। बस्तड़ी के राम दत्त ने बेटे के लापता होने के कारण आत्महत्या कर ली थी। बस्तड़ी से एक किलोमीटर दूर पत्थरकोट में मकान के मलबे में दबकर एक व्यक्ति की मौत हुई थी, जबकि चर्मा मंदिर के श्याम बाबा की भी मलबे में दबने से मौत हो गई थी।
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