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Pithoragarh News: कर्तव्य पथ पर फिर दिखेगी कुमाऊं की कला

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पिथौरागढ़। गणतंत्र दिवस पर इस बार कर्तव्य पथ पर उत्तराखंड की झांकी में राज्य के पारंपरिक छोलिया नृत्य की धूम दिखाई देगी। यह दूसरा मौका होगा जब गणतंत्र दिवस की झांकी में छोलिया नृत्य को शामिल किया गया है। इससे पहले 26 जनवरी 1978 को पिथौरागढ़ के आठगांव शिलिंग के छोलिया दल ने प्रस्तुति दी थी। इस बार भीम राम कोहली के नेतृत्व में किनीगाड़ का छोलिया दल उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को देश और दुनिया के सामने रखेगा।
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किनीगाड़ का 17 सदस्यीय छोलिया दल भीम राम कोहली के नेतृत्व में उत्तराखंड की झांकी के साथ छोलिया नृत्य प्रस्तुत करेगा। भीम राम ने बताया कि संस्कृति निदेशक बीना भट्ट के प्रयास और पिथौरागढ़ के पूर्व जिला सूचना अधिकारी गिरजा शंकर जोशी के सहयोग से यह मौका मिला है।
छोलिया नृत्य को पहचान दिलाने के लिए लंबे समय से कार्य कर रहे नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के हेमराज बिष्ट का कहना है कि यह पूरे राज्य के लिए बड़ी उपलब्धि है। इससे कलाकारों को प्रेरणा मिलेगी। वर्तमान में पिथौरागढ़ में 65 छोलिया दल हैं। उन्होंने कहा कि पहली बार 26 जनवरी 1978 को आठगांव शिलिंग के छोलिया दल ने मोहन राम के नेतृत्व में प्रस्तुति दी थी। यह दल सूचना महानिदेशालय (उत्तर प्रदेश) की ओर से गणतंत्र दिवस पर गया था।
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दल में ये कलाकार हैं शामिल
इंद्र प्रसाद, शेखर प्रसाद, भरत प्रसाद, दया किशन, भीम राम कोहली, शेखर राम, सोनू कुमार, जय शंकर प्रसाद, सुरेश प्रसाद, देवेंद्र प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद, जगदीश राम, पंकज कुमार, बब्लू प्रसाद, भरत राम, प्रकाश राम, जगदीश।
यहां भी देंगे प्रस्तुति
छोलिया दल 25 जनवरी को प्रधानमंत्री आवास, 28 जनवरी को राष्ट्रपति भवन, 29 को जनजाति मंत्री भवन, 30 को गृहमंत्री आवास और 31 जनवरी को रक्षामंत्री आवास में प्रस्तुति देगा।
राजा सोमचंद ने शुरू की थी छोलिया नृत्य की परंपरा
पिथौरागढ़। चंद वंश के राजा सोमचंद के विवाह के समय से ही छोलिया नृत्य की परंपरा शुरू हुई थी। सोमचंद चंद वंश के पहले राजा थे। उनका शासन 700 से 721 ईसवी तक था। उनकी राजधानी चंपावत थी। उन्होंने कत्यूरी शासक की बेटी से विवाह किया था।
छोलिया युद्धभूमि में लड़ रहे शूरवीरों की वीरता का मिश्रित छल का नृत्य है। दुश्मन को कैसे छल से हराया जा सकता है यही इस नृत्य में दर्शाया गया था। ढोल वादकों के बताए संकेत के अनुसार सेना के लड़ाके, नर्तक व्यूह रचना करते हुए छोलिया नृत्य करने लगते हैं। युद्धभूमि में ढोल वादक मात्र वीरों का उत्साह बढ़ाने के लिए ढोल नहीं बजाता था वह युद्धकला में भी प्रवीण होता था। संवाद
सजा-धजा रहता है छोलिया दल
पिथौरागढ़। छोलिया दल के कलाकार चूड़ीदार पायजामा, लंबा चोला, कमर में रंगीन पेटी, सिर पर पगड़ी, गले में रंगीन रुमाल, पैरों पर रंगीन पट्टियां, पगड़ी में लाल रंग का तुर्रा, कानों में बाली और सिंदूर लगाते हैं। उनके हाथों में ढाल, तलवार रहते हैं। छोलिया नृत्य की टोलियों को विवाह समारोह में बुलाया जाता है। 1990 के दशक में पहाड़ों पर बैंड वादकों के आने से छोलिया नृत्य की परंपरा पर असर पड़ने लगा। संवाद
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