नाचनी (पिथौरागढ़)। तल्ला जोहार के सिलंगड़ा घाटी में गन्ने की खेती और गुड़ बनाने का काम 152 साल पुराना है। गुड़ में किसी भी प्रकार का रसायन नहीं मिलाया जाता है। यहां बनने वाले गुड़ लालिमा लिए कत्थई रंग का होता है। पूरी तरह जैविक यह गुड़ 200 से 250 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है।
सिलंगड़ा घाटी में नापड़, सुरखेत, भूकना, मूर्ति, खतेड़ा गांवों में पहले बहुतायत में गन्ने की खेती होती थी। इसको देखते हुए 1870 में सुरखेत निवासी सुंदर सिंह के परदादा स्व. नैन सिंह हल्द्वानी से डेढ़ क्विंटल वजनी मशीन लाए थे। तराई क्षेत्र दूर होने के कारण गांव में ही गन्ने के रस से गुड़ बनाने का काम शुरू किया गया। अब सुंदर सिंह के पास अन्य गांवों के लोग भी उनके वहां गन्ने का रस निकालने लाते हैं। वह एक एकड़ में गन्ना लगाते हैं।
बताते हैं कि एक नाली में पैदा होने वाले गन्ने से तीन क्विंटल गुड़ निकलता है। 50 लीटर रस में आठ से 10 किलो गुड़ निकलता है। बैलों के माध्यम से पेराई की जाती है। कुछ गुड़ बेच देते हैं और कुछ अपने उपयोग के लिए रखते हैं। उन्होंने बताया कि गन्ने के रस को पकाने के बाद गाढ़े तरल पदार्थ को सख्त होने से पहले ही बोतलों में भर दिया जाता है, जिसे खुद कहा जाता है। खुद को हलवा, मीठी पूरी में प्रयोग किया जाता है। मडुवे की रोटी के साथ खाते हैं।
पलायन का असर
नाचनी (पिथौरागढ़)। हालांकि गांवों से हो रहे पलायन का असर गन्ने की खेती भी भी पड़ा है। अब पहले की तुलता में काफी कम किसान ही गन्ना उत्पादन कर रहे हैं। पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य दीपक चुफाल कहते हैं कि गन्ना विभाग और मंत्री केवल तराई पर ध्यान देते हैं। यहां के गन्ने को प्रोत्साहन दिया जाए तो रोजगार का प्रमुख माध्यम बन सकता है।
गुड़ उत्पादन से जोड़ने के लिए बनाया समूह
नाचनी (पिथौरागढ़)। क्षेत्र के किसानों ने गुड़ के उत्पादन को बढ़ाने और लोगों को गुड़ की खेती के लिए प्रेरित करने के लिए जय धुमरीनाग समूह बनाया है। समूह के अध्यक्ष धीरज सिंह, गणेश सिंह कोषाध्यक्ष, सुंदर सिंह, नारायण सिंह, भरत सिंह, दान सिंह, गोपाल सिंह सदस्य हैं। ग्राम्या परियोजना के तहत किसानों को गन्ने की खेती को बढ़ावा देने के लिए कार्य किया जा रहा है। भैंसकोट में भी ग्राम्या ने एक मशीन उपलब्ध कराई है।
सिंचाई की नहीं पड़ती जरूरत
नाचनी (पिथौरागढ़)। नलतूरिया (कांटी), काला और पौठ प्रजाति के गन्ने की खेती की जाती है। गन्ने के लिए पानी की जरूरत होती है लेकिन पूर्वजों के जमाने से संग्रहित यह किस्म बगैर पानी के पैदा होती है। सुरखेत के चंदन सिंह बताते हैं कि बंदर, लंगूर गन्ने की खेती नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस कारण उन्हें दिक्कत होती है। गन्ने की 13 बार गुड़ाई, 13 बार निराई की जाती है। सालभर में एक बार गन्ने की फसल होती है। एक बार लगे गन्ने से चार साल तक पैदावार होती है।
पिथौरागढ़ में किसान गन्ना उगा रहे हैं। विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. रीना नौलिया ने इसकी रिपोर्ट भेजी है। उसका अध्ययन किया जा रहा है। यहां पाए जाने वाले गन्ने के रस का टेस्ट कराया जाएगा। यदि किसानों की संख्या में बढ़ोतरी होती है तो पिथौरागढ़ को भी ऊधमसिंह नगर एवं हरिद्वार की तरह गन्ना उत्पादक क्षेत्र में रूप में विकसित करने की पहल की जाएगी।
- हंसा दत्त पांडे, आयुक्त, गन्ना एवं चीनी उद्योग, उत्तराखंड।