मुनस्यारी तहसील से अलग कर बनाई गई बंगापानी तहसील ढाई साल बाद भी पटरी पर नहीं आई है। तहसील में स्थापना के बाद से तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो की नियुक्ति नहीं हुई है। प्रमाणपत्रों के लिए धारचूला तहसील पर निर्भरता बनी है।
कांग्रेस शासनकाल में फरवरी 2015 में बंगापानी में तहसील स्थापित हो गई थी। 6 मई 2015 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बंगापानी तहसील का उद्घाटन किया। तब तत्कालीन सीएम ने स्थायी तहसीलदार के साथ ही अन्य पदों पर नियुक्ति का भरोसा दिलाया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तहसील में तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो के साथ ही चार पटवारियों के पद रिक्त हैं। सात के स्थान पर मात्र तीन पटवारी तहसील में तैनात हैं।
सप्ताह में दो दिन शुक्रवार और शनिवार को धारचूला के तहसीलदार बंगापानी में लोगों की समस्याएं सुनते हैं।
तहसील में ऑनलाइन सिस्टम भी नहीं है। यहां प्रमाणपत्रों के लिए आवेदन तो लिए जाते हैं, लेकिन जारी धारचूला से होते हैं। रजिस्ट्रार कानूनगो और दो लिपिक संविदा में कार्यरत हैं। कुल मिलाकर तहसील खुलने का जो लाभ बंगापानी, मदकोट क्षेत्र के लोगों को मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल रहा है। अब लोगों को नई सरकार से तहसील को व्यवस्थित करने की उम्मीद है।
अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही
बोना निवासी धन राम कहते हैं कि बंगापानी तहसील से जो अपेक्षाएं थीं, वह पूरी नहीं हो पा रही हैं। सरकार को तहसीलदार समेत सभी पदों पर तैनाती करनी चाहिए, ताकि लोगों को तहसील का लाभ मिल सके।
व्यवस्था सुधारे सरकार
वल्थी निवासी पुष्कर सिंह वर्ती कहती हैं कि तहसील खुली थी तो लगा था कि अब घर के नजदीक तहसील स्तर के काम हो जाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। प्रमाणपत्र तक तहसील में नहीं बन पा रहे हैं। सरकार को व्यवस्था सुधारनी चाहिए।
शिकायतों का निराकरण नहीं हो रहा
मवानी निवासी गोविंद राम का कहना है कि तहसील में अधिकारियों की तैनाती न होने से तहसील के कार्यों के साथ ही अन्य शिकायतों का निराकरण नहीं हो रहा है। तहसील में पूरे स्टाफ की तैनाती होनी चाहिए, तभी इसका लाभ मिलेगा।