11 साल बाद भी सोर घाटी की सीवर ट्रीटमेंट योजना साकार नहीं हो पाई है। बजट की कमी से योजना का काम फिर ठप हो गया है। दूसरी ओर सहायक जलस्रोतों से होते हुए महाकाली में अनिस्तारित सीवरेज की गंदगी बदस्तूर जा रही है। योजना में विलंब का सीधा खामियाजा पर्यावरण प्रदूषण के रूप में उठाना पड़ रहा है।
पिथौरागढ़ में सीवर ट्रीटमेंट योजना 2006 में स्वीकृत हुई थी। 2007 में काम शुरू हुआ और 2012 तक चला। इसके बाद बजट की कमी से काम रोक दिया गया। वर्ष 2015 में योजना का रिवाइज किया गया। वर्ष 2016 के आखिर में दोबारा काम शुरू हुआ। योजना के तहत ऐंचोली और निराड़ा में सवा छह एमएलडी क्षमता के दो ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जा रहे हैं। प्लांट का काम 80 फीसदी हो चुका है, जबकि अब तक 57 किमी सीवर लाइन में से 26 किमी लाइन ही बिछी है।
45 करोड़ की इस योजना में अब तक सरकार ने 10 करोड़ रुपया ही जारी किए हैं, जबकि निर्माण आगे बढ़ाने के लिए कार्यदायी संस्था को 23 करोड़ की दरकार है। दूसरी ओर अधूरे ट्रीटमेंट प्लांट से होते हुए रोजाना 60 लाख लीटर गंदगी सहायक चंद्रभागा और ठुलीगाड़ जल स्रोतों के जरिये महाकाली नदी में जा रही है।
ठेकेदार निर्माण से खड़े कर चुका हाथ
कार्यदायी संस्था को निर्माण करा रहे ठेकेदार को छह करोड़ रुपये का भुगतान करना है। धन की कमी और सरकार से बजट न मिलने से ठेकेदार को लंबे समय से भुगतान नहीं हुआ है। इन हालातों में ठेकेदार ने निर्माण आगे बढ़ाने से हाथ खड़े कर दिए हैं। इसके चलते ट्रीटमेंट प्लांट का काम ठप पड़ा है।
बजट में देरी से नौ करोड़ बढ़ गई लागत
इस योजना में बजट की देरी से निर्माण की लागत पहले प्रस्तावित डीपीआर से नौ करोड़ रुपये बढ़ चुकी है। 2006 में योजना की प्रस्तावित लागत 36 करोड़ थी, जबकि 2015 में रिवाइज होने के बाद इसकी लागत नौ करोड़ बढ़कर 45 करोड़ पहुंच चुकी है।
बजट की कमी से ट्रीटमेंट प्लांट का काम अटक गया है। ठेकेदार बिना भुगतान आगे काम करने से मना कर चुका है। योजना को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 23 करोड़ रुपये की जरूरत है।
-आशुतोष उपाध्याय, एई, जल निगम
अनिस्तारित सीवरेज से पर्यावरण को हो रहे नुकसान और सीवर ट्रीटमेंट की जरूरत को देखते हुए निर्माण जल्द से जल्द पूरा कराना प्राथमिकता है। सरकार से बजट जारी करने के लिए पुरजोर पैरवी की जाएगी।
-सी रविशंकर, डीएम, पिथौरागढ़