अस्कोट (पिथौरागढ़)। इसे जलवायु परिवर्तन ही कहा जा सकता है कि घाटी वाले इलाकों में समय से पहले आम, लीची, अमरूद, काफल में बौर तो आ चुके हैं, लेकिन यहां के जंगलों में काफल भी पक गए हैं। मई-जून में पकने वाला काफल मार्च में ही पककर पुष्ट हो चुका है। रविवार को ओगला में दो बच्चे काफल बेचने पहुंचे।
देवभूमि में वसंत ऋतु का लोकप्रिय पहाड़ी फल काफल जो गर्मी से बचाता है। अनेक प्राकृतिक औषधियों से भरपूर इस फल को आयुर्वेद में कायफल के नाम से भी जाना जाता है। इस रसीले पहाड़ी फल के पीछे पहाड़ में कहानी और कहावत भी हैं। चैत्र मास आते ही दो चिड़िया काफल पर गीत गाती सुनाई देती हैं। एक चिड़िया कहती है काफल पाको मैं नि चाख्यो.... तब दूसरी चिड़िया कहती है पूर्रे पुतई पुर्रे पुर..। पहाड़ में काफल पर कहावत भी कहते हैं कि देवभूमि में काफल नहीं खाया तो खाया क्या..।
अस्कोट से 10 किमी दूर ओगला के जंगल में कुछ पेड़ों पर काफल पक चुके हैं। इस जंगल में काफल के अधिकांश पेड़ों में बौर आए हुए हैं लेकिन 3-4 पेड़ों में ही काफल पके हैं। ओगला में दो बच्चे काफल बेचने पहुंचे तो लोग आश्चर्यचकित रह गए। दोनों बच्चे दस किलो तक काफल लाए थे। उन्होंने छोटे कांच की गिलास से 25 रुपया गिलास काफल बिक्री किया।
ओगला निवासी गजेंद्र और भूप्पी का कहना है कि वह जानवरों को चुगाने जंगल गए थे। इस दौरान उन्हें कुछ पेड़ों में काफल पके दिखे। दोनों ने काफल तोड़े और रविवार को ओगला में बेचने के लिए आए। कहा कि उन्हीं पेड़ों पर दो-चार दिन में फिर से काफल पक जाएंगे, फिर से बेचने को लाएंगे।
पिथौरागढ़ की जिला उद्यान अधिकारी डा. मीनाक्षी जोशी बताती हैं कि कोई पेड़ पहले ही फल दे देते हैं, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। हो सकता है इन पेड़ों को सभी पौष्टिक तत्व प्राप्त हो गए हों, जिससे पहले फल पुष्ट हो गए हैं। जलवायु परिवर्तन के असर से ही कुछ पेड़ों में काफल जल्दी पक गए हैं।