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ओ हिमा लस्का कमर स्यार खेतन मा पुत हालि दे...

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थल (पिथौरागढ़)। पहाड़ में जहां एक ओर पलायन और जंगली जानवरों के आतंक के कारण अधिकतर लोग खेती छोड़ चुके हैं वहीं कई लोग अभी भी खेती कर परिवार पाल रहे हैं। थल में परंपरागत तरीके से गीत गाकर धान की रोपाई की जा रही है। इन दिनों घाटी वाले क्षेत्रों में रोपाई वाले खेतों से ओ हिमा लस्का कमर स्यार खेतन मा पुत हालि दे... आदि कर्णप्रिय गीत सुनाई देे रहे हैं।
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डुंगरी गांव के गंगा सिंह मेहता भी 20 साल से अपनी 40 नाली जमीन में रोपाई विधि से धान की खेती कर रहे हैं। गंगा का कहना है कि जमीन मां के समान हैं, उसे बंजर छोड़ना पाप जैसा है। वह हर साल प्राचीन कश्मीरिया प्रजाति किस्म का ही धान लगा रहे हैं। इस धान का बीज खेतों के साथ ही उन्हें दादा-परदादा से धरोहर में मिला।
इस कारण जुलाई में हर साल धान की रोपाई के लिए डुंगरी गांव में उत्सव का माहौल रहता है। बृहस्पतिवार को जब गांव की महिलाओं ने सहकारिता की भावना से खेत में धान के पौधे रोपे। सुबह से शुरू हुई रोपाई शाम छह बजे खत्म हुई। महिलाओं ने छपेली, न्यौली, चेतीआदि कुमाऊंनी गीत गाकर रोपाई की।
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महिलाओं ने खेत की मालकिन को संबोधन कर कहा - ओ हिमा लस्का कमर हाव मा ऊछ्याली बेर स्यार खेतन पुत हालि दे...। महिलाओं ने को धूरा हुनेल मासी क फूल.., पारी भिड़ा बुरसी फूली गे, कमला की बोजी पकै दे रोटी गाड़ी नैहे गे छ पीपलकोटी आदि लोकगीत गाते हुए रोपाई पूरी करवाई।
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