रामगंगा पर केदारेश्वर के पास बनाए गए झूलापुल की 24 साल से मरम्मत नहीं हुई है। पुल पर लगाया गया डामर उखड़ चुका है। उसमें बिछाई गई टिन की चादरें गल चुकी हैं। लोगों ने खुद ही पुल पर पड़े छेदों को भरने के लिए पत्थर और लकड़ी डाल रखी है। लोग जानजोखिम में डालकर इस पुल से सफर कर रहे हैं।
लोगों को सुविधा देने के लिए 1984 में इस झूलापुल का निर्माण किया गया था। पुल से अंगड़ियागाड़ा, पिल्खी, नैनी, रोटन, मुसगांव, बैगनियागाड़ा, जालड़ी, सिगोली, पनोली, रैतोली, भुवनेश्वर, चौड़मन्या के लोग आवाजाही करते हैं। नदी को पार करने के लिए नजदीक में कोई दूसरा पुल न होने के कारण लोगों को इसी से सफर करना पड़ता है। पुल से आम लोगों के साथ-साथ स्कूली बच्चे भी आवाजाही करते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि लोनिवि ने 1993 में एक बार झूलापुल की मरम्मत की थी। उसके बाद पुल की ओर ध्यान देना छोड़ दिया। लोनिवि के बेड़ीनाग डिवीजन को कई बार लोगों ने पत्र देकर पुल की दशा बता दी है। अब वह जिलाधिकारी सी रविशंकर के सामने इस पुल की समस्या को रखेंगे।
पुल से बच्चों को भेजना खतरनाक
स्थानीय निवासी नीमा खनका का कहना है कि जर्जर हो चुके झूलापुल से बच्चों को भेजना खतरनाक है। अब बच्चों को पुल पार कराने के लिए खुद भी आना पड़ता है। वह कहती हैं कि यह कैसा विकास है कि पुल पर चलने में लोगों की रूह कांपने लग जाए।
नेताओं को ऐसे मामलों में ध्यान देना चाहिए
स्थानीय निवासी कविता भट्ट का कहना है कि चुनाव के समय वोट के लिए दर-दर घूमने वाले नेताओं को खुद ही ऐसी समस्या का संज्ञान लेना चाहिए। वह कहती हैं कि यह समस्याएं इतनी जटिल भी नहीं हैं कि समाधान न हो सके।