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‘बौराणी कौतिक लागी रौ, सैमज्यू को धारे मां’

Tue, 15 Nov 2016 10:47 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बेड़ीनाग
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बौराणी मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करते कलाकार - फोटो : अमर उजाला
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बौराणी मेला एवं लोक सांस्कृतिक महोत्सव के मुख्य मंच पर रात भर सांस्कृतिक दलों का धमाल रहा। कलाकार पूरी रात दर्शकों को बांधे रहने में सफल रहे। मंगलवार सुबह तीन बजे अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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सांस्कृतिक संध्या का उद्घाटन बेड़ीनाग के पूर्व प्रमुख खुशाल भंडारी ने किया। उभरते स्थानीय लोक गायक कल्याण बोरा ने स्वरचित गीत ‘बौराणी कौतिक लागी रौ, सैमज्यू को धारे मां’ की प्रस्तुति देकर लोगों को भावविभोर कर दिया। जनजागरण सांस्कृतिक कला समिति बिंदुखत्ता की टीम ने ग्रुप लीडर प्रख्यात लोक गायक प्रह्लाद मेहरा के नेतृत्व में कार्यक्रमों की शानदार प्रस्तुति दी। इस टीम ने दर्शकों को कुमाऊंनी, गढ़वाली के अलावा छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, पंजाबी और हिमाचली संस्कृति की झलक भी दिखाई।

आधी रात के बाद नवयुवक सांस्कृतिक समिति, अल्मोड़ा के कलाकारों ने माहौल में समां बांध दिया। कलाकारों ने पंजाबी, भोजपुरी नानस्टाप गानों से धमाल मचाया। कड़ाके की ठंड के बावजूद दर्शकों ने कार्यक्रमों का पूरा आनंद उठाया। कार्यक्रम में भाजपा नेता फकीर राम टम्टा, गोकुल गंगोला, मीना गंगोला आदि मौजूद थे। बौराणी मेला एवं लोक संस्कृति महोत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष राजेंद्र बोरा ने सभी का आभार जताया। संचालन शिक्षक हेम पांडे ने किया। 
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इस बार भी मशाल रही आकर्षण का केंद्र 
इस बार भी बौराणी की ऐतिहासिक मशाल मेले का मुख्य आकर्षण थी। सोमवार रात के बारह बजे पुलईचापड़ गांव से लाई गई छिलूके (चीड़ के पेड़ के ज्वलनशील भाग की लकड़ी) की 30 फीट लंबी मशाल की सैम मंदिर में परिक्रमा शुरू हुई। लोगों का हुजूम जयकारे के साथ इसके स्वागत के लिए उमड़ पड़ा। स्थानीय भाषा में इसे ‘रांखा’ कहते हैं। मेले में पहुंचे 80 वर्षीय बुजुर्ग धन सिंह बोरा ने बताया कि मेले में मशाल लाने की परंपरा सदियों पुरानी है। वह बचपन से इस परंपरा के साक्षी हैं। इस बार भी मशाल को मंदिर की सात परिक्रमा के बाद मंदिर प्रांगण में स्थापित कर दिया गया। मशाल की परिक्रमा के दौरान मुख्य मंच के कार्यक्रम रोक दिए गए थे। 

परंपरागत संस्कृति की झलक में आ रही गिरावट
बेड़ीनाग (पिथौरागढ़)। बौराणी मेला संस्कृति, परंपरा और आस्था का अनूठा संगम माना जाता है। यहां जुएं की प्रथा को समाप्त कर महोत्सव का दर्जा दिया गया था, लेकिन इस बार मुख्य मंच की चमक-दमक ने संस्कृति के उन पहरुओं को कुछ निराश किया जो यहां की इस सांस्कृतिक निशानी को सदियों से संजो कर रखे हुए हैं। मंदिर परिसर में झोड़ा, चांचरी और जागर के ऐतिहासिक आयोजन का ग्राफ इस बार भी गिरता नजर आया, क्योंकि दर्शकों ने मुख्य मंच की तरफ रुख कर लिया था। ऐतिहासिक मशाल के मंदिर परिसर में स्थापित करने के बाद यहां देवजागर और झोड़ा चांचरी का अद्भुत परंपरागत कार्यक्रम इस बार धीमी गति से हुआ। शायद यही कारण रहा होगा कि क्षेत्र के प्रसिद्ध चांचरी गायक धन राम दिन में तो यहां दिखे, लेकिन रात में नजर नहीं आए। वरना उनके हुड़के पर थाप देने के साथ सैकड़ों महिला-पुरुषों का जमघट चांचरी के मैदान में अपना हुनर पेश करने उतर आता था। हालांकि सुबह 3 बजे मुख्य मंच पर कार्यक्रमों की समाप्ति के बाद लोगों का हुजूम मंदिर परिसर में उमड़ा। अखंड धूनी में देव डांगर मोहन सिंह, गुलाब राम, फकीर राम, जीत राम आदि ने जागर के माध्यम से श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं को पूरा किया। महोत्सव समिति के अध्यक्ष राजेंद्र बोरा ने बताया कि अगले साल से परंपरागत आयोजनों को प्रोत्साहित किया जाएगा। यहां की सांस्कृतिक विरासत को संजो कर रखेंगे।
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