पिथौरागढ़। रई गाड़ ( यक्षवती नदी) को संरक्षित करने के लिए एक बार फिर कवायद शुरू हो गई है। इससे पहले भी वन विभाग सहित कई कुल नौ विभागों ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत नदी को संरक्षित करने का कार्य किया था, लेकिन ये योजना आज तक परवान नहीं चढ़ पाई।
2018 में तत्कालीन डीएम डॉ. रंजीत सिन्हा ने यक्षवती नदी के संरक्षण की पहल शुरू की थी। इसमें वर्ष 2018 में वन विभाग सहित नौ अन्य विभागों ने नदी के पानी को बढ़ाने के लिए उद्गम स्थल मड़ सिलौली सहित 10 हेक्टेअर भूमि पर पौधरोपण का कार्य किया था। दो साल बाद आज कई पौधे देख-रेख के अभाव में सूख चुके हैं। मड़ खड़ायत, मड़ सिलौली, जीबी गांव में यक्षवती नदी साफ है। एआरटीओ ऑफिस पहुंचने के बाद ये नदी प्रदूषित होती जा रही है।
आलम यह है लोगों ने सीवर लाइन यक्षवती नदी में डाले हैं, जिससे नदी का पानी दूषित हो रहा है। पालिका भी सीवरेज डालने वालों पर कार्रवाई का दावा तो करता है, लेकिन यह अब तक यह दावा भी हवाई साबित हुआ है। इसके साथ ही रई यक्षवती नदी क्षेत्र के आसपास कई लोगों ने अतिक्रमण किया है। यक्षवती नदी को पुनर्जीवित करने के लिए प्रशासन के लिए नदी क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने भी बड़ी चुनौती होगी।
प्रथम चरण में यक्षवती नदी के मुख्य स्रोत में बढ़ाया जाएगा पानी
पिथौरागढ़। वन विभाग यक्षवती नदी के संरक्षण के लिए डीपीआर बनाएगा। नौ अन्य रेखीय विभाग भी इस पर कार्य करेंगे। उप प्रभागीय वनाधिकारी नवीन पंत ने बताया कि प्रथम चरण में मुख्य स्रोत का पानी बढ़ाने का कार्य होगा। इसके लिए असुुरचूला टॉप, पुनेड़ी टॉप, मड़ सिलोली क्षेत्र में चारा, फल के पौधों को लगाया जाएगा।
रई में मिनी डैम की स्वीकृति मिलने के बाद भी नहीं हो पाया कार्य
पिथौरागढ़। यक्षवती नदी में वर्ष 2016 में सिंचाई विभाग को मिनी डैम, जल संवर्धन, संरक्षण, पेयजल के लिए शासन से 1 करोड़ 46 लाख रुपये की स्वीकृति मिली थी। सिंचाई विभाग के ईई अहमद फरहान खान ने बताया कि आर्मी की जमीन होने के कारण यहां पर इन कार्यों के लिए दिक्कत आ रही थी। इस कारण धन शासन को वापस लौटा दिया था।
स्कन्द पुराण में है यक्षवती नदी का उल्लेख
पिथौरागढ़। इतिहासकार मदन चंद्र भट्ट के अनुसार स्कंदपुराण में इस नदी का उल्लेख है। पिथौरागढ़ नगर के मध्य में बहने वाली रईगाड़ से ‘ठुलिगाड़’ को ‘यक्षवती’ नदी कहा गया है। यक्षवती नदी ‘असुर’ प्रांत से निकलती थी। आज भी ठुलिगाड़ के उद्गम के समीप दो ऊंचे ‘असुरचुल’ नाम के पहाड़ हैं। यहां लोक देवता ‘असुर’ की स्थापना है। यहां पर कई धार्मिक आयोजन होते हैं।