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बांध और आईजीएसटी से विस्थापित होने लगे लोग

Fri, 09 Mar 2018 10:21 PM IST
राजेश पंगरिया/अमर उजाला, झूलाघाट
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आपदा के बाद बंद पड़ी झूलाघाट की दुकानें - फोटो : अमर उजाला
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल जाकर पंचेश्वर बांध बनाने के संकेत देने और नेपाल जाने वाले सामान पर आईजीएसटी लगने के बाद क्षेत्र के लोग विस्थापन का मन बनाने लगे हैं। लोगों ने इससे पहले तैयारी स्वरूप कुमाऊं के कई नगरों में अपने व्यापार को बनाए रखने के लिए दुकानों और जमीनों की खरीदारी भी शुरू कर दी है। एक वर्ष पहले आई डीपीआर के बाद अब तक नेपाल के जूलाघाट और भारत के झूलाघाट कस्बे के 17 परिवारों ने नेपाल के धनगड़ी, भारत के पिथौरागढ़ एवं हल्द्वानी में अपना व्यापार और आशियाना बना लिया हैं। होली से एक दिन पहले झूलाघाट बाजार में होली दल भी नहीं घूमा। कम संख्या होने के कारण लोगों ने एक ही स्थान पर होली मनाई।

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महाकाली नदी के किनारे बसे झूलाघाट सहित दर्जनों गांवों के लोगों में पंचेश्वर बांध बनने का डर तो है ही, वर्तमान सरकार द्वारा देश में जीएसटी लगाने के बाद नेपाल के सामान पर अलग से आईजीएसटी लगाने से उनका कारोबार भी मंदा हो गया है। स्थिति यह है कि नेपाल जाने वाला सामान मंहगा होने से नेपाल के बैतड़ी, दार्चुला और डडेलधूरा के व्यापारियों ने झूलाघाट मंडी की तरफ रुख करना कम कर दिया हैं। सामान के महंगा होने एवं मैदानी क्षेत्र के अतरिया और धनगड़ी मंडी में सामान सस्ता मिलने के कारण झूलाघाट की मंडी में सुनसानी होने लगी हैं। इसी कारण कई थोक व्यापारियों ने माल मंगाना बंद कर दिया हैं।

व्यापारियों और क्षेत्र के लोगों को सरकार के पंचेश्वर बांध के फैसले से लगने लगा हैं कि भविष्य में उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ सकता हैं। इसी कारण यहां के लोगों ने मैदानी क्षेत्र में भी जमीन खरीदनी शुरू कर दी है। नेपाल के जूलाघाट निवासी जगदीश जोशी, सुरेंद्र जोशी, मोहन खड़ायत, अनिरुद्ध जोशी, रवींद्र थापा, तर्क बहादुर थापा और विष्णु दत्त जोशी आदि पलायन कर गए हैं। कुछ ने अपनी दुकानों को रिश्तेदारों को देकर नेपाल के तराई महेंद्रनगर और धनगड़ी में मकान बना लिए हैं। इसी तरह झूलाघाट के दुर्गादत्त शर्मा, दयानिधि कलखुड़िया, शेखर कलखुड़िया, रमेश कलखुड़िया, घनश्याम भट्ट, अशोक कलखुड़िया, कोमलानंद जोशी, दामोदर भट्ट, भगवान सिंह थापा, सुभाष पंगरिया आदि परिवार सहित झूलाघाट छोड़कर पिथौरागढ़, लोहाघाट, चंपावत, टनकपुर, खटीमा और हल्द्वानी बस गए हैं। नदी से लगे कानड़ी, सीमू, बलतड़ी आदि अधिकतर गांवों के लोगों ने बनबसा, किच्छा, सितारगंज, रुद्रपुर और हल्द्वानी में जमीन भी खरीद ली हैं। संयुक्त परिवार के दीपक श्रेष्ठ, सौरव जुकरिया, डब्बू गड़कोटी, कमलेश भट्ट, अतुल डिक्टियां ने पिथौरागढ़ में दुकान खोल दी है।
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वहीं, पंचेश्वर बांध की डीपीआर आने के बाद सरकार द्वारा क्षेत्र के विकास के लिए भी पैसा नहीं आ रहा। वर्ष 2013 की आपदा में महाकाली नदी द्वारा झूलाघाट की एक दर्जन दुकानों के नीचे कटान हुआ था, लेकिन विभागीय उदासीनता और विकास न होने से दुकानें भी बंद पड़ी हैं और इनमें से कई ने या तो कारोबार बंद कर दिया हैं या दुकान कस्बे से बाहर खोल दी हैं।

झूलाघाट में 75 प्रतिशत लोग काली कुमाऊं के
भारत-नेपाल सीमा पर बसे झूलाघाट कस्बे में 75 प्रतिशत लोग काली कुमाऊं से आकर बसे हैं। इसमें से कुछ परिवारों की तीन पीढ़ी यहां गुजर गई हैं। संख्या बल के हिसाब से भी सबसे ज्यादा लोग काली कुमाऊं के ही हैं। इसी कारण यहां पर होली का त्योहार बड़े ही धूमधाम से बनाया जाता था।

पिथौरागढ़ में जमीन न होने के कारण हल्द्वानी का रुख
सीमावर्ती बाजारों का व्यापार समाप्त होने, पंचेश्वर बांध की डीपीआर आने, बांध के काम में तेजी आने और जिला मुख्यालय के आसपास जमीन न होने के कारण लोग हल्द्वानी की ओर रुख कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक हल्द्वानी सर्किल में प्रत्येक माह 10 से 12 जमीन की रजिस्ट्री पिथौरागढ़ के लोग करा रहे हैं।

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