कानड़ी गांव में पीली सरसों के खेतों का निरीक्षण करते कृषि वैज्ञानिक और किसान
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कृषि विज्ञान केंद्र ने पंत पीली सरसों-1 प्रजाति को झूलाघाट के नजदीक कानड़ी गांव के एक हेक्टेयर क्षेत्र में बोया है। अब तक के अध्ययन से यह बात सामने आई है कि इस प्रजाति की सरसों को पक्षियों से नुकसान नहीं पहुंच रहा है। इस प्रजाति की सरसों की फलियां नीचे की ओर झुकी होती हैं। इस कारण पक्षी नुकसान नहीं पहुंचा पाते।
पीली सरसों में तेल की मात्रा अधिक होती है। इसके दाने पीले रंग के होते हैं। पहाड़ों पर बोई जा रही सरसों की परंपरागत प्रजाति की तुलना में इसका उत्पादन 25 से 30 फीसदी अधिक होता है। तेल निकालने के बाद बची हुई खली को जानवर काफी चाव से खाते हैं। यह दूध की मात्रा बढ़ाने में भी सहायक होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डा. जितेंद्र क्वात्रा ने बताया कि सरसों के इन बीजों से प्रति नाली 25 से 30 किलोग्राम तक पैदावार मिल जाती है। उन्होंने बताया कि कानड़ी के 20 किसानों को प्रयोग के तौर पर पंत पीली सरसों-1 के बीज बांटे गए। करीब एक हेक्टेयर में यह फसल बोई गई है। अब सरसों की फसल तैयार होने वाली है।
अब तक के अध्ययन में सामने आया है कि उत्पादन बेहतर है और पक्षियों से नुकसान नहीं हुआ है। किसानों ने कहा कि वह इन बीजों का अगली बार से ज्यादा प्रसार करेंगे। कानड़ी में सरसों के खेतों के निरीक्षण के समय कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. जीवन लाल, आजीविका परियोजना के राकेश मठपाल, भास्कर जोशी, अमित नौटियाल, सुभाष चंद्र, प्रगतिशील किसान सुनीता चंद, कलावती चंद आदि मौजूद थे।