बस्तड़ी में बुधवार सुबह से मलबा हटाने के लिए लोनिवि समेत कई विभागों की जेसीबी लगा दी गई हैं। मलबे से अब सिर्फ बर्तन, कपड़े जैसी सामग्री निकल रही है। मलबे में दबे जानवरों और लोगों के सड़ने से दुर्गंध करीब दो किलोमीटर दूर तक फैलने लगी है। बस्तड़ी में मंगलवार तक कटर मशीनों, गैंती और संबल की आवाज गूंज रही थी। बुधवार से वहां पर मशीनों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। गांव के सभी लोग राहत कैंपों में रुके हैं। वहीं पर उनको विभिन्न सुरक्षा एजेंसियां भोजन एवं अन्य सामग्री उपलब्ध करा रही हैं।
बस्तड़ी में अब मलबे के किसी के मिलने की संभावना बहुत कम है। बस्तड़ी में लोगों के चेहरों पर मायूसी है। अपनों को खोने के बाद जीवित बचे लोगों के सामने अब सिर्फ भविष्य का संकट है, यदि प्रशासन जल्दी उनके लिए मकान और जमीन तय नहीं करती तो राहत कैंपों में लंबे समय तक रह पाना संभव नहीं होगा। बस्तड़ी के लोग अब अपने मूल गांव में नहीं जाना चाहते, जो शव मिले हैं, उनका क्रियाकर्म चल रहा है और जो लोग अभी मलबे में दबे हैं उनके वापस आने का सिर्फ इंतजार ही रह गया है। सेना, आईटीबीपी, एसएसबी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ ने बुधवार को भी काम जारी रखा है।
खोजबीन में जुटे हैं एसएसबी जवान
बस्तड़ी के दक्षिणी हिस्से में खोजबीन का काम एसएसबी की 55वीं वाहिनी ने संभाल रखी है। दक्षिणी हिस्से में पत्थरकोट गांव है। इस गांव तक मशीनों का पहुंचना संभव नहीं है। इसे देखते हुए जवानों ने संबल, गैंती से खुदाई जारी रखी। एसएसबी के कार्यवाहक सेनानी नंदन सिंह बिष्ट ने बताया कि 60 जवान लगातार खोजबीन कर रहे हैं। काम में लगे जवानों ने बताया कि अब दुर्गंध ज्यादा आने से दिक्कत बढ़ रही है। फिर भी मलबे में दबे लोगों की खोजबीन का काम जारी रखा गया है। जवानों ने बताया कि आपदा के बाद चलाए गए रेस्क्यू अभियान के दौरान कई बार मौसम ने बाधा खड़ी की। मलबा बारिश के पानी से कीचड़ में तब्दील होने लगा। कई बार तो घुटनों के ऊपर तक कीचड़ में जाकर काम करना पड़ा। जवानों ने बताया कि उच्चाधिकारियों के बराबर प्रोत्साहन और सहयोग से उत्साह बना रहा। जवानों का यह भी कहना है कि इस तरह की विपदा किसी पर न आए। कई परिवार प्राकृतिक आपदा के साथ उजड़ जाते हैं। लोगों की जीवनभर की कमाई एक झटके में समाप्त हो जाती है। मकानों की सिर्फ दीवारें नजर आ रही हैं। रेस्क्यू अभियान में लगे जवानों का कहना है कि कम से कम अब बस्तड़ी गांव दोबारा नहीं बस पाएगा। वहां पर नए सिरे से बसने की संभावनाएं समाप्त हो चुकी हैं।
गायत्री परिवार और सोसायटी की सामग्री पहुंची
बस्तड़ी के पीड़ितों के लिए बुधवार को गायत्री परिवार हरिद्वार की ओर से राहत सामग्री पहुंचाई गई। 60 किट सामग्री के साथ यहां पहुंचे कामता प्रसाद ने बताया कि हर किट में राशन, बर्तन, तिरपाल, कंबल, कपड़े जैसी सामग्री है। घनश्याम ओली चाइल्ड वेलफेयर सोसायटी पिथौरागढ़ की टीम ने भी बच्चों और बुजुर्गों को राहत सामग्री प्रदान की। स्वामी क्लब नारायणनगर और डीडीहाट यूथ क्लब की ओर से भी सामग्री बांटी जा रही है। गायत्री परिवार की सामग्री के साथ मोतीलाल, रमेश बिन मनुहार, भवानी दत्त, मीनाक्षी, मंजू तिवारी, सरोज भट्ट, मंजू जोशी यहां पहुंचे हैं। घनश्याम ओली चाइल्ड वेलफेयर सोसायटी की ओर से अमित ओली, निक्कु कापड़ी आदि ने कहा कि जो बच्चे अनाथ हो गए हैं उनकी परवरिश की जिम्मेदारी सोसायटी लेगी। अनाथ हो चुके अमन और पीयूष को सोसायटी ने पूरा संरक्षण देने का एलान किया है। तहसीलदार पीसी पंत ने राहत सामग्री बांटने में मदद की।