बस्तड़ी गांव में अब कोई भी नहीं रहना चाहता। गांव के लोग बारिश की बूंदों के जमीन पर गिरते ही सिहर उठते हैं। गांव के लोगों का कहना है कि सरकार जल्दी से भू-विज्ञानियों की टीम यहां भेजे और वन पंचायत की जमीन में गांव के लोगों के लिए मकान बनाए।
30 जून की रात से लोगों की अब भी रूह कांपती है। सदियों से बसे इस गांव में जीवित बचे लोगों का तो यही कहना है कि वह अब गांव में पांव तक नहीं रखना चाहते। हर परिवार का कोई न कोई सदस्य हादसे की भेंट चढ़ा। लोगों ने वर्षों से संजोकर रखे सामान को घरों से निकाल लिया है और लोग सामान लेकर जीआईसी, प्राथमिक विद्यालय में आकर रुके हैं। मुख्य बस्तड़ी गांव में मलबे का ढेर है और उसी मलबे में कई लोग दबे हैं।
अब गांव में नहीं रहना चाहती
बस्तड़ी गांव की 80 वर्षीय आनंदी देवी का कहना है कि अब किसी भी सूरत में गांव में नहीं रहना चाहती। जिंदगी के आखिरी मोड़ पर पहुंची आनंदी ने कहा कि गांव के नौजवानों के मलबे में दफन होने से सब कुछ लुट गया है। अब इस गांव का नाम लेने से भी रूह कांपती है।
बस्तड़ी में अब कभी पैर नहीं रखेंगे
हादसे में अपने भाई और बहू को गंवाने वाले 60 वर्षीय गोविंद भट्ट कहते हैं कि अब वह गांव में पैर नहीं रखेंगे। वह जीआईसी सिंघाली में रुके हैं। कहते हैं कि यह गांव किसी भी दशा में रहने लायक नहीं है। सरकार को सबसे पहले यही काम करना चाहिए कि गांव को शिफ्ट किया जाए।
वन पंचायत की जमीन में बसाएं
बस्तड़ी के वन पंचायत सरपंच नंदाबल्लभ भट्ट का कहना है कि वन पंचायत की जमीन का भू-विज्ञानियों से सर्वे किया जाए और पूरे गांव को वहां पर बसाया जाए। वह कहते हैं कि वन पंचायत की जमीन सुरक्षित है। वहां पर लोगों को बसाने में कोई समस्या नहीं आएगी। सरकार को तत्काल फैसला लेना चाहिए।
पहाड़ के नाम से ही लगता है डर
बस्तड़ी के युवा हरीश भट्ट ने आपदा में अपने भाई और बहू को खो दिया है। वह कहते हैं कि जिस पहाड़ में जिंदगी बिता रहे थे अब उसका नाम सुनने में भी डर लगता है। उनका सीधा आशय यह है कि गांव के लोगों को तराई में बसा दिया जाए। सरकार तराई में जमीन उपलब्ध कराए।