सत्यालगांव पर पलायन का ग्रहण नहीं लगा है। इस गांव को अब तक एक भी परिवार ने नहीं छोड़ा है। सुखद बात यह है कि पिछले 20 वर्ष में गांव में परिवारों की संख्या 60 से बढ़कर 85 हो गई है। गांव में सुविधाओं को देखते हुए नापड़, डाणा, बल्याऊ, मालाझूला, तुरगोली, जजौली के कई परिवारों ने यहां मकान बना लिए। सत्यालगांव से थल का राजकीय इंटर कॉलेज करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है। दो किलोमीटर के दायरे में कई सरकारी और निजी स्कूल संचालित हो रहे हैं। तीन किलोमीटर दूर गोचर का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। गांव की सीमा तक सड़क पहुंची है। पेयजल का कोई संकट नहीं है। सब्जी और अनाज का अच्छा उत्पादन हो जाता है।
इस गांव की एक खासियत यह है कि यहां पर सामाजिक एकता देखने को मिलती है। हर किसी के सुख-दुख में गांव के सभी लोग शामिल होते हैं। अन्य गांवों से आकर इस गांव में बसे लोगों को कोई बेगानापन नहीं लगता। उत्सव और त्योहारों को यह लोग उत्साह से मनाते हैं। इसी अच्छे माहौल को देखते हुए 35 परिवार यहां किराए का मकान लेकर भी रहने लगे हैं। गांव के लोगों का कहना है कि सुख, सुविधा वाली जगह पर जाकर बसने वालों को वह सामाजिक माहौल नहीं मिल सकता जो अपने गांव में मिलता है। गांव के लोग यह भी कहते हैं कि यदि थल को विकासखंड मुख्यालय बनाया जाए तो आसपास के गांवों का विकास तेज होने लगेगा और पलायन से मुक्ति मिल जाएगी।
पलायन के प्रति सोच बदलने की जरूरत
सत्यालगांव के उपप्रधान सुनील सत्याल का कहना है कि पलायन के लिए लोगों की खुद की सोच भी जिम्मेदार होती है। अपने संसाधनों का उपयोग करना, अपने समाज के बीच रहना ही सबसे सुकून भरा होता है। पलायन की पीड़ा से बचने के लिए लोगों को सोच बदलनी होगी। अपने हकों और अधिकारों को हासिल करने के लिए लोगों को सरकार पर दबाव बनाना होगा। फिर गांव कैसे समृद्ध नहीं होते।
पहाड़ छोड़कर जाने की कदापि न सोचें
सत्यालगांव में जमीन खरीदकर मकान बनाने वाले अनिल कार्की का कहना है कि सत्यालगांव में सभी सुविधाएं हैं। जीवनयापन, शिक्षा, चिकित्सा की सुविधा मिल जाए तो फिर कोई भी अन्यत्र जाने की नहीं सोचता। कम से कम पहाड़ के गांवों को इसी तरह से समृद्ध बनाया जा सकता है। वह कहते हैं कि लोगों को पहाड़ छोड़कर जाने की कदापि नहीं सोचनी चाहिए। अपने गांव को खुशहाल बनाया जाए।