सीमांत तहसील मुनस्यारी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को शासन ने वर्ष 2014 में पीपीपी मोड के तहत बरेली के गंगाशील नर्सिंग होम के सुपुर्द कर दिया था। इसके पीछे सरकार की यही मंशा थी कि निजी हाथों में जाने के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार आएगा और यहां के लोगों को बेहतर सुविधा मिलेगी, लेकिन समय बीतने के साथ ही अस्पताल की अव्यवस्थाएं भी सामने आने लगी हैं। यह बात अलग है कि पीपीपी मोड में जाने के बाद अस्पताल में उपकरणों की व्यवस्था तो हो गई, लेकिन विशेषज्ञों के नहीं होने से इन उपकरणों का लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है।
अस्पताल को पीपीपी मोड में सौंपने से पहले इस अस्पताल में दो महिला डॉक्टर, दो एमबीबीएस डॉक्टर और एक होम्योपैथी डॉक्टर तैनात थे। उस समय अस्पताल में किसी प्रकार की जांच, अल्ट्रासाउंड, एक्सरे नहीं हो पाते थे। इतना जरूर था कि अस्पताल में हर समय डॉक्टर मौजूद रहते थे। व्यवस्था में सुधार के नाम पर अस्पताल पीपीपी मोड में तो चला गया, लेकिन अस्पताल प्रबंधन मानक के अनुसार डॉक्टरों की तैनाती नहीं कर पाया है। पीपीपी मोड में जब अस्पताल सौंपा गया तब यह तय हुआ था कि अस्पताल में 12 डॉक्टर तैनात रहेंगे, लेकिन इस मानक को अब तक पूरा नहीं किया जा सका है।
अस्पताल में इस समय हड्डी रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट, निश्चेतक और आपातकालीन डॉक्टर तैनात हैं। अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ, सर्जन, ईएनटी, बाल रोग, नेत्र रोग विशेषज्ञ के पद खाली हैं। अस्पताल की व्यवस्थाओं और डॉक्टरों की कमी को पूरा करने की मांग को लेकर कई बार जनप्रतिनिधियों ने आवाज उठाई, लेकिन इसका असर किसी पर नहीं पड़ा।
मार्च में तय होगा अस्पताल का भविष्य
मुनस्यारी के पीपीपी मोड अस्पताल का अनुबंध मार्च 2018 में समाप्त हो जाएगा। उसके बाद इस अस्पताल का संचालन पीपीपी मोड से होगा या फिर सरकार इसका संचालन अपने तरीके से करेगी, यह बाद में तय होगा। लोग भी इस समय इसी अनिश्चय की स्थिति में हैं। सीमांत की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार क्या विकल्प तय करेगी यह किसी की जानकारी में नहीं है।
एक बार पीपीपी मोड से हटने की बात उठी थी
कांग्रेस शासनकाल में पिछले साल मुनस्यारी अस्पताल को पीपीपी मोड से हटाने की बात सामने आई थी। तब सरकार ने लोहाघाट के अस्पताल को तो पीपीपी मोड से अलग कर दिया था, लेकिन मुनस्यारी का फैसला नहीं हो पाया। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अस्पताल को पीपीपी मोड से हटाने की मांग कर चुके हैं। उक्रांद ने तो कई बार इस मुद्दे पर आंदोलन भी किया।