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अ से अनार, आ से आम, पढ़ाई की राह में मुश्किलें तमाम

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No Road To Kanadhar
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कनालीछीना (पिथौरागढ़)। पहाड़ के लोगों के जीवन में परेशानियां भी पहाड़ जैसी ही होती हैं। सड़क के अभाव में आज भी कई लोग विकास से अछूते हैं। बात सिर्फ शिक्षा की करें तो बच्चों को अ से अनार, आ से आम पढ़ने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
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सड़क सुविधा से वंचित कनालीछीना विकासखंड के काणाधार, डूंडू और मलान गांव के 22 स्कूली बच्चे सड़क नहीं होने के चलते 20 किमी की पैदल यात्रा कर जीआईसी छड़नदेव जाते हैं। खड़ी चढ़ाई पर किताबों के भार को कंधे पर लेकर 10 किमी का सफर दो घंटे में तय कर स्कूल पहुंचना और शाम में लौटना इनके जीवन का हिस्सा बन गया है। जंगली जानवरों के भय से ये बच्चे समूह में स्कूल पहुंचते हैं।
स्कूल आने जाने में ही इन्हें पांच घंटे का समय लग जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में मलान, काणाधार के लोगों ने सड़क निर्माण की मांग के लिए चुनाव बहिष्कार किया था मगर उनकी नाराजगी को सभी ने नजरअंदाज किया। ग्रामीणों ने इस बार विधानसभा चुनाव बहिष्कार का मन बनाया है।
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बारिश होती है तो करनी पड़ती है छुट्टी
कनालीछीना। बारिश के मौसम में इन बच्चों के लिए पढ़ना मुश्किल हो जाता है। बच्चे बारिश के मौसम में घर पर ही पढ़ाई करते हैं। काणाधार के डूंडू गाड़ के पास बारिश में रास्ता पार करना मुश्किल हो जाता है। यहां पर छोटा सा नाला बारिश में विकराल रूप ले लेता है। ऐसे में बच्चों के लिए नाला पार करना मौत के मुंह में दावत देना है। इस पर ये बच्चे बारिश होने पर स्कूल की छुट्टी कर लेते हैं।
तीन गांव के 22 बच्चे जीआईसी छड़नदेव पढ़ने के लिए जाते हैं। कुल 20किमी की पैदल यात्रा में पांच घंटे का सफर करना मुश्किल भरा होता है। ऐसे में बच्चे थक जाते हैं। ऐसे में वो घर आकर पढ़ाई कैसे करेंगे। - हेमा पंत, प्रधान, काणाधार
पिछले विधानसभा चुनाव में सड़क निर्माण की मांग के लिए चुनाव बहिष्कार किया था। इस बार भी सड़क निर्माण की कार्यवाही नहीं होगी तो चुनाव बहिष्कार किया जाएगा। पिछले बार तो किसी के कान में जूं नहीं रेकी। - राजेश पंत, पूर्व प्रधान
बच्चों के घर से स्कूल और स्कूल से घर आने तक उनकी चिंता लगी रहती है। रास्ते में जंगली जानवरों का खतरा रहता है। ऐसे में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। इस वर्ष क्षेत्र में तेंदुए का आतंक रहा। - गोपू पंत, अभिभावक
शासन-प्रशासन ने पिछले चुनाव बहिष्कार से कोई सबक नहीं लिया। अगर जनप्रतिनिधियों ने ध्यान दिया होता तो आज बच्चे पैदल ने वाहन से जा रहे होते। मगर चुनाव संपन्न होने के बाद भी कोई हाल पूछने तक नहीं आया। - मोहन सिंह, अभिभावक
अब पांच वर्ष बाद जनप्रतिनिधि हाथ जोड़े खड़े नजर आएंगे। पिछले दशकों से किसी ने क्षेत्रवासियों का दर्द नहीं समझा। बच्चे किन हालात में स्कूल से घर आते हैं, इसका दर्द किसी ने महसूस नहीं किया। - पुष्कर जोशी, अभिभावक
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