देवलथल तहसील के हाल-बेहाल हैं। यहां अब तक इंटरनेट की सुविधा तक मुहैया नहीं कराई गई है। नतीजतन लोगों को प्रमाणपत्र बनाने के लिए 30 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ जाना पड़ता है। आनलाइन कोई प्रमाणपत्र यहां नहीं बन पाता।
16 जुलाई 2006 को देवलथल में उपतहसील का गठन हुआ था। प्रदेश सरकार ने अक्तूबर 2014 में उपतहसील को पूर्ण तहसील का दर्जा दे दिया, लेकिन हालात अब तक नहीं सुधरे हैं। इस तहसील में आठ पटवारी क्षेत्र भी शामिल हैं, लेकिन चार पट्टियों में पटवारी के पद रिक्त हैं। एक पटवारी को दो-दो पट्टियों का काम संभालना पड़ता है। तहसील कार्यालय को जिला पंचायत के एक पुराने भवन में चलाया जा रहा है। तहसीलदार का काम संविदा वाले तहसीलदार को सौंपा गया है। उनके पास वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार नहीं हैं।
सरकार ने देवलथल एवं कनालीछीना में एक साथ उपतहसील और पूर्ण तहसील खोल दी थी। दोनों स्थानों की दूरी 15 किलोमीटर से भी कम है। पहले यह विचार भी सरकार के सामने रखा गया था कि दोनों तहसीलों को मिलाकर एक तहसील खोली जाए और तहसील कार्यालय देवलथल तथा कनालीछीना के मध्य में हो, लेकिन इस विचार पर सहमति नहीं बन पाई। सरकार ने दोनों स्थानों के लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास तो किया, लेकिन अब कनालीछीना और देवलथल तहसील की स्थिति एक सी हो गई है। नई तहसीलों के गठन के बाद भी लोगों की निर्भरता पुरानी तहसीलों से कम नहीं हुई है।
सुविधाएं दिए बिना तहसील खोलना गलत
जिला पंचायत सदस्य जगदीश कुमार का कहना है कि नई तहसीलों में जब सरकार सुविधा दे पाने की स्थिति में नहीं है तो उनको खोलना गलत है। नई तहसीलों के गठन के बाद भी लोगों की कोई समस्या हल नहीं हो रही है। लोगों का धन और समय पहले की तरह ही खर्च हो रहा है। उन्होंने कहा कि तत्काल नई तहसीलों को इंटरनेट से जोड़ा जाए और पूरा स्टाफ दिया जाए।
यह जनता के साथ सरासर धोखेबाजी
बाराबीसी उत्थान समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र बसेड़ा का कहना है कि नई तहसीलों के नाम पर जनता के साथ धोखा किया जा रहा है। वह कहते हैं कि सिर्फ लोगों को संतुष्ट करने के लिए तहसील खोलकर ज्यादा आफत खड़ी कर दी है। अब लोग कहां जाएं। घर के नजदीक की तहसील से लोगों का कोई काम नहीं हो पा रहा है। मजबूरन लोग आंदोलन करेंगे।