यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर में शामिल त्रिपुरासुंदरी का मुख्य मेला शुक्रवार को संपन्न हो गया। सैकड़ों लोग मेले में पहुंचे। मंदिर में पशुबलि की प्रथा है, शाम तक 60 भैंसों और सैकड़ों बकरियों की बलि दी गई। देवी का डोला मुख्य मंदिर से देवी के मायके कापड़ी गांव तक गया। मायके से वापस मंदिर में आकार देवी की शृृंगार सामग्री और चांदी के त्रिशूल को भंडारगृह में सुरक्षित रखा गया।
मंदिर में बृहस्पतिवार रात हवन हुआ। भक्तों ने मनोकामना की पूर्ति के लिए हाथ में दीया रखकर आराधना की। शुक्रवार सुबह 6.30 बजे से पूजा शुरू हुई। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष त्रिलोक सिंह ने बताया कि कम से कम 60 भैंसों की बलि दी गई। इस बार मेला प्रबंधन समिति ने मिठाई, रेस्टोरेंट, स्थानीय उत्पादों की बिक्री के लिए मूल्य निर्धारण किया था। इस कारण मेले में लोगों को मुनासिब दामों पर सामान मिलता रहा। मेले में इस बार शराब के खिलाफ भी अभियान चलाया गया। मेला समिति के सदस्य लाल सिंह ने बताया कि मेले को शराब से मुक्त रखने की कोशिश की गई और इसमें कामयाबी भी मिली। मेला समिति के स्वयंसेवक प्रकाश थापा के नेतृत्व में युवाओं ने बाहर से आने वाले लोगों को सुविधा दी। हाथरस से आए कन्हैया लाल, मथुरा से आए श्रीराम, हाथरस के ही मूलचंद, मथुरा के कमल किशोर ने बताया कि बिक्री के हिसाब से मेला सामान्य रहा। महेंद्रनगर के सांसद बहादुर थापा, पुलिस उपमहानिरीक्षक विजयराज भट्ट, बैतड़ी के डीएम लीलाधर अधिकारी, एसपी मोहन प्रसाद पोखरेल ने मेले में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरे दिन ड्यूटी दी।
मधेसी आंदोलन का मेले पर असर
नेपाल में चल रहे मधेसी आंदोलन और नाकेबंदी का त्रिपुरासुंदरी मेले में भी असर दिखाई दिया। डीजल की गंभीर किल्लत के कारण जुलाघाट से बैतड़ी तक मात्र 30 फीसदी वाहनों का ही संचालन हो पाया। मेले में अन्य सामान की भी कमी देखी गई। बैतड़ी में लंबे समय से डीजल और पेट्रोल की किल्लत बनी हुई है। आवश्यक वस्तुओं के साथ दवाओं का भी अभाव होने लगा है।
हर चढ़ावा होता है रजिस्टर में दर्ज
त्रिपुरासुंदरी मंदिर में जो भी चढ़ावा होता है उसे रजिस्टर में नोट किया जाता है। सारी व्यवस्था बेहद सिस्टम से संचालित होती है, यदि भारतीय क्षेत्र का कोई श्रद्धालु मंदिर में चढ़ावा करता है तो उसे अपना पूरा ब्योरा मंदिर कमेटी की ओर से नियुक्त कर्मचारी रख लेते हैं।