मृतक ससुर की पेंशन की रकम को आठ साल तक डकारने वाले दामाद गोविंद सिंह भौंरियाल निवासी बेड़ीनाग ने मंगलवार को सिविल जज जूनियर डिवीजन अविनाश कुमार श्रीवास्तव की अदालत में आत्मसमर्पण किया। दामाद पर मामले को दबाने के लिए फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र हासिल करने का भी आरोप है। कोर्ट ने आरोपी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। इस मामले में आरोपी मृतक की बड़ी पुत्री की गिरफ्तारी पर अदालत से स्टे मिला है।
बेड़ीनाग के थानाध्यक्ष एसएस नयाल ने बताया कि आरोपी भौंरियाल ने पत्नी की बड़ी बहन कमला रौतेला के साथ मिलकर 27.30 लाख की धोखाधड़ी की, जिस पर 7 अक्तूबर 2015 को बेड़ीनाग एसबीआई के शाखा प्रबंधक सतेंद्र सिन्हा ने दोनों के खिलाफ थाने में धोखाधड़ी समेत तमाम धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराई।
थानाध्यक्ष ने बताया कि जांच में सामने आया कि आरोपी भौंरियाल के ससुर मोहन सिंह धामी निवासी बलगड़ी की मृत्यु 10 जुलाई 2007 को हो गई थी, जबकि आरोपी भौंरियाल अपने मृत ससुर के फर्जी जीवित प्रमाण पत्र बैंक में जमा करता रहा। साथ ही मृत ससुर के फर्जी हस्ताक्षरों से जारी चेकों के जरिए रकम अपने बैंक खातों में ट्रांसफर करता रहा। बताया कि 27 लाख 30 हजार रुपये की रकम में से भौंरियाल के खाते में 22.05 लाख, कमला रौतेला के खाते में 5.25 लाख रुपये मृत ससुर के पेंशन खाते से ट्रांसफर हुए। भौंरियाल के ससुर सेना में ऑनरेरी कैप्टन थे।
थानाध्यक्ष ने बताया कि बैंक द्वारा धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपी भौंरियाल ने मामले को दबाने के लिए एक और षड्यंत्र रचा। नगर पंचायत में फर्जी शपथ पत्र देकर ससुर की मृत्यु 10 जून 2015 को होने का प्रमाण पत्र हासिल कर लिया। इस मामले में नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी हरिचरण सिंह ने झूठा शपथ पत्र देकर मृत्यु प्रमाण पत्र हासिल करने का आरोप लगाते हुए फरवरी 2016 में बेड़ीनाग थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई और प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया। इसके बाद पुलिस ने दोनों (भौंरियाल और कमला रौतेला) के बैंक खाते सीज कर दिए हैं। थानाध्यक्ष ने बताया कि आरोपी कमला रौतेला की गिरफ्तारी पर उच्च न्यायालय ने रोक लगाई है। आरोपी गोविंद भौंरियाल डेढ़ दशक तक पत्रकारिता से जुड़ा रहा। पिछले साल मामला सामने आने के बाद संबंधित अखबार से भी भौंरियाल को विदा होना पड़ा। इस बीच आरोपी अग्रिम जमानत के प्रयास में भी लगा रहा। सफलता नहीं मिलने पर मंगलवार को उसने सरेंडर कर दिया।
बिना बैंक कर्मियों की मिलीभगत के घपलेबाजी संभव नहीं
बगैर बैंक कर्मियों की मिलीभगत के इतना बड़ी जालसाजी संभव नहीं। बुजुर्गों को बैंक में जीवित प्रमाण पत्र देना होता है और इसके लिए उन्हें स्वयं उपस्थित होना होता है। बीमार होने की दशा में मेडिकल सर्टिफिकेट जमा करना होता है। कैसे आठ साल तक बैंक पेंशन का भुगतान करता रहा, यह जांच के बिंदु हैं। बकौल पुलिस फर्जी चेक के जरिए 27.30 लाख रुपये की रकम दोनों आरोपियों के खातों में ट्रांसफर हुई है। इस अवधि में रहे शाखा प्रबंधक, कैशियर और चेकों के भुगतान को डील करने वाले बैंक कर्मी तक इस मामले की आंच आएगी।