शीतकाल में लगभग छह महीने तक गर्म घाटियों में रहने के बाद उच्च हिमालयी गांवों के लोगों की वापसी शुरू हो गई है। बुधवार को माइग्रेशन गांवों को लौटने वाला पहला जत्था थल पहुंचा। बृहस्पतिवार को यह जत्था क्वीटी में रुकेगा और आठ अप्रैल को कालामुनि पहुंचेगा। उसके बाद कुछ समय तक खलियाटॉप में भेड़ों और बकरियों को चराने के लिए रुकेंगे। गर्मी के सीजन में यह लोग अपनी भेड़ों, बकरियों समेत लीलम, लखतल और जौलढुंगा के बुग्यालों में चले जाएंगे। अक्तूबर तक यह मूल गांवों में ही रहेंगे। जैसे ही हिमपात का सीजन शुरू होगा तो यह फिर से गर्म घाटियों को उतरने लग जाएंगे।
माइग्रेशन गांवों को लौट रहे प्रथम दल में हरकोट गांव के प्रह्लाद सिंह धर्मशक्तू, जौलढुंगा के पान सिंह और दुम्मर के जगदीश सिंह शामिल हैं। इन तीनों के पास 325 भेड़ें हैं। अपने घरेलू सामान को ढोने के लिए इनके पास घोड़े भी हैं। बकरियों की रक्षा के लिए वह कुत्तों को भी साथ लेकर चलते हैं। उन्होंने बताया कि टनकपुर से थल पहुंचने में उनको 27 दिन का समय लग गया। अभी गांव पहुंचने में एक सप्ताह का समय और लगेगा। माइग्रेशन पर जाने वालों को भेड़ों को चराने की ज्यादा चिंता रहती है। मूल गांवों के आसपास चारा न मिलने के कारण भेड़ों को लेकर उच्च हिमालय की बुग्यालों को निकल जाएंगे।
तेंदुआ और चोरों का खतरा बढ़ा
भेड़, बकरियों समेत माइग्रेशन पर जाने वालों की समस्या लगातार बढ़ रही हैं। जंगलों में रात के समय भेड़ों समेत रुकने में तेंदुआ अक्सर बकरियों को मार देता है। इसके अलावा रात के समय मौका पाते ही चोर भी बकरियों को चुरा ले जाते हैं। भेड़पालकों का कहना है कि अब पहले जैसा दौर नहीं रह गया है। भेड़, बकरियों के समूह के साथ सफर करना अब असुरक्षित होता जा रहा है।
अब भेड़पालन के प्रति रुझान कम
उच्च हिमालयी क्षेत्र के गांव के लोगों में भेड़पालन के प्रति रुझान कम हो रहा है। पहले एक ही व्यक्ति के पास सैकड़ों भेड़ें होती थी, लेकिन अब यह संख्या सिमटती जा रही है। नई पीढ़ी के लोग इस तरह के काम को अपनाना नहीं चाहते। इस कारण भेड़पालन का यह व्यवसाय प्रभावित होता जा रहा है।