थल (पिथौरागढ़)। बेड़ीनाग विकास के पांखू में स्थित मां कोटगाड़ी में भक्तों की अटूट आस्था है। यहां लोग न्याय के लिए आते हैं। सच्चे मन से की गई आराधना को मां अवश्य स्वीकार करती हैं।
देवी भागवत पुराण के अनुसार 54 शक्ति पीठों की पूजा होती है। देवी सती के शव को गोद में लेकर जब शिवजी ने तांडव किया था। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसके 54 टुकड़े किए थे। यह टुकड़े जहां-जहां गिरे उस स्थान पर आदि शक्ति पीठ की स्थापना हुई।
पांखू के कोकिला स्थान पर देवी का योनि वाला भाग गिरा था। इसलिए यहां योनि आदि शक्ति पीठ की पूजा होती है। इसे कोट यानी न्याय की देवी भी कहा जाता हैं जो कोटगाड़ी माता के नाम से प्रसिद्ध हुई। यहां देवी सातवीं वैष्णवी के रूप में पूजी जाती है।
आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां आकर इसके तात्कालिक शक्ति और दिव्य महात्म्य का बखान किया था। इन्हें कोकिला माता के नाम से भी जाना जाता हैं। मां के दरबार में जर, जमीन और जोरू के विषय पर तुरंत फैसला होता है। जब लोगों को कहीं से न्याय नहीं मिलता है तब वह इस कोट में आकर सादे कागज में अपनी अर्जी लगाते हैं।
देवी को जंगल चढ़ाते हैं ग्रामीण
थल (पिथौरागढ़)। वनों के अंधाधुंध कटान से परेशान गांववासी अपने जंगल को भी देवी को चढ़ा देते हैं। देवी उनके जंगलों की देखभाल भी शक्ति से करती हैं। देवी के गर्भ गृह के भीतर जमीन के नीचे अविरल बहने वाली जल संपदा है। इसका सिंचाई और पीने के शुद्ध पानी के रूप में प्रयोग होता है। इसी प्रवाह से निकले पानी से कोकिला नदी या क्रांति नदी की महत्ता स्कंद पुराण में वर्णित है। कोटगाड़ी माता को लोग जहां डाक द्वारा भी अर्जी दाखिल करते हैं वहीं दूर से मनौती मानने पर भी वो सबकी सुन लेती है। वैसे तो वर्ष भर में भारत के सभी कोने से दर्शनार्थी पहुंचते हैं लेकिन यहां चैत्र नवरात्र और दशहरा की अष्टमी पर भव्य मेला लगता है। संवाद
सुबह बिस्तर में मिलती हैं सलवटें
थल (पिथौरागढ़)। मंदिर के पुजारी जीवन चंद्र पाठक रोज रात को देवी मां की सैया सजाते हैं। मां रात्रि को उस पर विश्राम करती हैं। सुबह के समय बिस्तर पर सलवटें मिलती हैं। संवाद